Saturday, 30 May 2020


संस्मरण -17 मई की फेसबुक पोस्ट से आगे
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जब -----गधा बनाया
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जब मैंने जोधपुर में पहली बार नौकरी जॉइन की तो यह शहर तब विकसित हो रहा था। ठीक उसी तरह जैसे भारत की जवानी परवान चढ़ रही थी। मन में नई उमंग और आशा की गागर लेकर मैं भी जीवन के समंदर में अपनी नन्ही सी नांव लेकर उतर रहा था। समंदर इसलिये कह रहा हूँ कि इसका ओर -छोर किसी को पता नहीं चलता । सागर विशालता के साथ -साथ अनिश्चितता का भी प्रतीक है। उर्ध्वगामी चेतना लेकर सम्पूर्ण मानवता इस सागर में जीवन के माणिक और मोती प्राप्ति हेतु उतरने के लिए सदसंकल्पित है। जोधपुर के लोग भी इसी दिशा में बढ़ रहे थे। वे अब भीड़भाड़ के मौहल्ले छोड़कर नई बस्तियां बसा रहे थे,ताकि खुली हवा का आनंद ले सके। अपने बढ़ते परिवारों को एक अच्छा रहन -सहन दे सकें। राजशाही के दौरान बने पोल और परकोटों के बाहर इसी लक्ष्य की पूर्ति हेतु रातानाडा,भगत की कोठी,वासनी,शास्त्रीनगर आदि नई बस्तियां आकार ग्रहण कर रहीं थी। शास्त्रीनगर जोधपुर इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट की कालोनी है। शाम को खाने- पीने के बाद हम यू.पी.,बिहार और बंगाल के प्रवासी युवा रेलवे कर्मी शास्त्री सर्किल पर इकट्ठा होते। भारतभूषण शर्मा, शैलेन्द्र शर्मा,संतपाल स्वरूप,सिद्धनाथ,जी.पी. पाण्डेय,तरुण चटर्जी,दिलीप मुखर्जी ,आर.एन.सहाय,शशि प्रकाश,विनोद दीक्षित, आदि का यह गिरोह रात के बारह बजे तक चुटकुले,गाने गाना और अच्छी बुरी मजाक खूब करते रहते ।तब टीवी का जमाना था नहीं । आज के इस दौर को देखे तो टीवी का न होना शायद अच्छा ही था । जब नींद आने लगती गिरोह के सदस्य धीरे-धीरे सर्किल से गायब हो जाते। यह शायद उम्र के अनुकूल ही आचरण था। उस समय तक जोधपुर में सामन्तवाद का प्रभाव दिखाई देता था जो उनकी जीवन शैली में ऐसे घुल गया था जैसे दूध में पानी या शक्कर , जबकि उत्तरप्रदेश या इतर राज्यों के युवा तो लोकतांत्रिक भारत में पैदा हुये थे । "हुकुम सा" कहना यहां व्यवस्था के प्रति सम्मान प्रदर्शन था। मैं भी धीरे -धीरे मारवाड़ी सीखने लगा और फिर उनसे उनकी बोली में बतियाने लगा।सबको अपनी बोली-भाषा से प्रेम होना स्वाभाविक है। शब्द कानों के रास्ते से दिल को छूते है तो शांत झील में हलचल पैदा करते है। पानी पर जमी पूर्वाग्रहों की गहरी हरी काई को भी संवाद हटा देता है।जोधपुर के अधिकांश लोग,धार्मिक, बहुत सज्जन,सरल ,सहज और मिष्टभाषी आज भी ।मेरी पटरी उनसे बैठने में देर नहीं लगी । वे मुझे स्नेह देने लगे।फिर मुझे जो कार्य दिया गया था ,उसके लिये कार्यालय का हर कर्मचारी और अधिकारी मुझसे संपर्क करता था।वहां मेरे बॉस थे देवकरण शर्मा । उनके पिताजी आगरा से आकर जोधपुर रेलवे में स्टेशन मास्टर नियुक्त हुए थे और फिर वहीं बस गए। वे उनकी दूसरी पीढ़ी थी जो रेलवे में सेवा दे रही थी। देवकरण शर्मा जी का मुझपर असीम स्नेह रहा। उन्होंने मुझे पुत्र की तरह रखा और मेरा कार्यालय के काम ही नहीं ,बल्कि जीवन के कई गुर अनजाने में सिखा गए। उनका हृदय पवित्र और जीवन सरल था। धर्म में पूर्ण आस्थावान शर्मा जी को मैंने शीघ्र ही कार्यालय की चिंताओं से मुक्त कर दिया। वे भी अल्पकाल की प्रगति से संतुष्ट थे और सभी को कहते थे कि यह लड़का बहुत मेहनती और जिम्मेदार है। विभागीय ट्रेनिंग में जब मैंने टॉप किया तो मेरे मुख्य अधिकारी श्री लाल चंद गेरा भी बहुत प्रसन्न हुए और जब उन्होंने कहा 'तुम मेरे ऑफिस की क्रीम हो " सुनकर हृदय गदगद हो उठा।
हमारा बैच दफ्तर के काम को बढ़िया ढंग से करता था और साथ में अन्य सांस्कृतिक गतिविधियों में भाग लेता था। रेलवे का कार्यक्रम हो या शहर का ,हम शिरकत करने का जुगाड़ निकाल ही लेते थे। उस जमाने मे टाउन हॉल में काफी साहित्यिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे। कालूराम प्रजापति उस समय लोकप्रिय लोक गायक थे। एक बार उन्होंने टाउन हॉल में अपना कार्यक्रम प्रस्तुत किया ।हम भी स्टेज पर उनकी टीम में जुगाड़ कर बैठ गए। आज यह गीत यूट्यूब पर उपलब्ध है।आप भी आनंद लिए बिना न रहेंगे ।।




फिर कुछ दिन बाद एक कव्वाली का कार्यक्रम हुआ तो मैं और भारतभूषण शर्मा बाकायदा कव्वालों की ड्रेस में बैठे और कव्वाली में सुर से सुर मिलाया। कव्वाली के बोल थे ,,,
"सालाहसाल की जुस्तजू ने हमें चंद आँसू दिए चश्मे तर के लिए
दुश्मनों पर तुम्हारी इनायत रही ,हम तरसते रहे एक नज़र के लिए '
एक बार जोधपुर के रेलवे इंस्टिट्यूट में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम हुआ। उसने मैंने और भारत भूषण ने एक हास्य नाटक करने के लिये निवेदन किया। स्क्रिप्ट पढ़ने के बाद अनुमति मिली और मंचन कुछ इस तरह था।
(स्टेज से पर्दा उठता है। एक डॉक्टर की वर्दी पहनकर मैं एक यंत्र लेकर उपस्थित होता हूँ। यह यंत्र बजाने वाला बोंगो था । बोंगों में लंबे लंबे धागे बन्धे हुए थे और उसमें कुछ कागज़ के चौकोर टुकड़े फंसा रखे थे)
डॉक्टर : दोस्तो ,मेहरबानो, कद्रदानों आप सभी को सलाम ,नमस्ते ,आदाब और गुडईवनिंग है ।आज हम आपके सामने एक नया अविष्कार ले कर आये है। हमारी फार्मा कम्पनी ने एक ऐसे यंत्र का अविष्कार किया है जिसके द्वारा आपको बिना कोई टेस्ट कराए बीमारी का पता लग जायेगा।
दर्शकों की उत्सुकता जगती है। प्रश्न उछला,क्या करना होगा।
डॉक्टर: आपको कुछ नहीं करना होगा । बस इस धागे को अपनी अपनी सीधे हाथ की कलाई पर बांधना होंगा। एक पर्ची हम दे रहे है ।इसपर अपना नाम लिखकर हमे दे दें। हम इसे मशीन में फिट किये देते है। दो मिनट बाद ही इस मशीन में लगी आपकी नाम वाली पर्ची पर आपकी बीमारी यदि कोई है ,का नाम छप जाएगा।
(कुछ लोगों ने झिझकते हुए तो कुछ ने उत्सुकतावश धागा कलाई पर बांध लिया और नाम भी लिखकर दे दिया । डीएस,जोधपुर ( जिसे अब डीआरएम कहा जाता है ) जो कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे,उन्होंने भी धागा बांध लिया । पर्चियां मशीन में लगते ही, भारत भूषण शर्मा जो धोबी का रोल कर रहे थे, ने जोर से आवाज लगाई
"अबे ओ रामू, मेरे गधे कहाँ है?सुबह तुझे चराने के लिए दिए थे। रात हो गयी । अभी तक नहीं दिख रहे हैं ?
"मालिक,यहीं तो हैं सारे ।(कलाई में बंधे धागों वालो की ओर इशारा करते हुए कहा )मालिक ध्यान से देखो,सब बंधे तो पड़े हैं।"
मेरे यह कहते ही हॉल से हंसी का फव्वारा हाल में फूटा और पर्दा गिर गया। जिनके हाथ में धागे बन्धे थे ,सभी झेंप गए। लेकिन बाद में सभी मे प्ले की तारीफ की।
*
रामकिशोर उपाध्याय
क्रमशः

Saturday, 29 December 2018

नदी का खामोश हो जाना


वह निकली ही अकेली थी
वह पिघली भी अकेली थी

हँसती रहती वो पलपल
पवन को सुनाती रहती
गीत मधुरिम हो विह्वल
मिलाती सुर कोकिला से
सदा करती वो कलकल

उसका बहते रहने  न भाया
कुछ ले आये फावड़े,मशीन
कुछ ले आये ट्रेक्टर ,,,,और
खोद डाला अस्तित्व महीन

किसी ने उसे एक नद से जोड़ डाला
कहीं उसको रोककर जड़ दिया ताला
बलात निरंतर प्रवाह को मोड़ डाला
कोई ले आया कचरे का एक नाला
सुरसरि में बहने लगा  काला-काला
सो गयी जो भी थी उसकी सहेलियां
क्रोधित मछुवे ने जाल  तोड़ डाला

लोग अब भी जुट रहे हैं उसके तट
लेकर आस्था का अर्द्ध या पूर्ण घट
किन्तु वह अब नहीं चाहती बह जाना
मगर किसी को पता ही नहीं
उसका धीरे-धीरे खामोश होते  जाना
सरकारी विज्ञापनों  में
नदी अभी  भी ज़िंदा है
××
रामकिशोर उपाध्याय

Wednesday, 12 December 2018

ठंडा होता सूरज


हर तरफ शोर है 
धुंध में लिपटी भोर है 
खाकर जमीन की कसमें 
पेड़ों को हवाएं लील रही है 
समंदर में उबल रही हैं 
मछलियों की बस्ती
बादलों से बरस रही है
तेजाब की सूखी नदी
ध्रुव पर पेंग्विनों की
लाशों के अंबार हैं
कहने को सावन की फुंहार है
धवल चान्दनी अब जल रही है
पर सत्ता की घुड़दौड़ में
पश्चाताप नहीं,वार्तालाप नहीं
केवल प्रलाप है गहरे
या चल रहे हैं मौहरे
आमजन के वक्षस्थल पर रुपहले
कुछ तुरप के पत्ते ...नहले पर दहले
और न्याय का सूरज .....
ठंडा हो रहा है उदय होने से पहले
*
रामकिशोर उपाध्याय

कबतक चलेगा अंधेरों का राज


कहती रहती मत सोना और उठ जा तू
ओस में भी पेड़ की कोटर को बना लेती अपनी रजाई
फिर सूरज की किरणों से करती अपने गमगीन गीले पंखों की सफाई
बच्चों की खातिर खेतों में लगती दाना चुगने
आँख मीचकर करने लगती सपने बुनने
देख -देखकर शोर करते बच्चे
सारे जग के लगते अच्छे
नहीं किसी से भेद वह करती
मुंडेर पर बैठकर शाम को वह रहती हँसती
दूर गगन में उडती रहती पर नहीं भूलती घोसला अपना
नहीं तोड़ती किसी के घर का सपना
मगर उसकी ख़ुशी न बाज को भाती
बच्चों को पीछे से वह बतलाता उनकी जाति
कहता तुम कोयल हो,तुम हो कागा
फिर कैसे बंधा तुम्हारे मध्य ये प्रीत का धागा
बच्चे अब हो रहे थे बड़े
अपने पैरों पर होने लगे थे खड़े
अब नहीं खाते वे माँ का लाया तिनका दाना
अब उड़ाने लगे है बाज का फैंका मांसाहारी स्वादिष्ट खाना
माँ देख रही थी जलता घर सुहाना
उसको डस रहा था डर अनजाना
सोने का घोसला बनाने को उकसा रहा था बनकर गिद्ध
कर रहा था अपनी सत्ता का मकसद सिद्द
पेड़ों पर सोने के पिंजरे लटक गये धीरे -धीरे
पाँव में बंध गई लोहे की जंजीरे
मुंह पर ताले और धूप को निगल गए अँधेरे
अब कलरव नहीं होता, गाते सिर्फ भक्ति गीत वे सुबह- सवेरे
मन में सन्नाटा,तन पर हावी धन कुबेर
मुनिया आती नही अब मुंडेर
देख उसे एकदिन उपवन का एक माली बोला
कैसे हो आजाद ..... यह रहस्य खोला
फिर रोना भूल गई वह मेरे बन की चिड़िया
एकदिन जरुर होगी फिर से .........उसके खुले पंखों पर दुनिया
बढ़ता है जब -जब वंचितों के संतापों का ताप
सिंहासन पर भारी पड़ने लगते हैं जन-मन -गण के अभिशाप
प्राची से सूर्य उगेगा,आखिर कबतक चलेगा अंधेरों का राज
जनता ही ले लेती है एकदिन हर नरपति के सिर से ताज
*
रामकिशोर उपाध्याय

कोई रक्कासा नहीं हैं यहाँ



आज भी कल जैसी ही है एक रात 
रोज की तरह फिर वहीं बात 
वही तकिया ...
वही दो सर ..धड़कते जिस्म
आँखों में सुरमें की सलाई नहीं ......
काजल की .उँगलियाँ घूमती है
माथे चौड़ी बिंदी ..
होंठ पर अंग्रेजी ,,ना बाबा ना ..हिंदी
फूल तो हैं मगर नहीं है खुशबू
लथपथ जिस्म से निकले पसीने की बदबू
लाओ डियो स्प्रे कर दूं ,उसने कहा
वरना सुबह कमीज से कई प्रश्न होंगे
भूले हुए मौजें हर जवाब दे देंगे ,मौजें मत भूलना
अब जाओ सुबह बिस्तर की सिलवटें ठीक कर दूंगी
अपनी पेंट ठीक से पहन लेना
एक पेग और लगाओगे ........
सिगरेट का एक कश.... धुआं धुआं ...
उड़ गई सब हया
तुम कल न आ सको तो बतला देना
मैं साहिल को बुला लूंगी
हां ,मेरा भी आना है मुश्किल
रेखा भी ,,अकेली है कल ..
जानेमन ! यह शहर का इश्क है
जिसमें है...
न जुनून
न सुकून .......
सिर्फ जिस्मों का रक्स है ...मगर नहीं है कोई रक्कासा
न वो ,,न रेखा और न ही कोई शालिनी या बिपासा
*
रामकिशोर उपाध्याय

Sunday, 9 December 2018

अलभ्य और अखण्ड .. ==============

हर शब्द ...
जब हो जाता है निस्शब्द 
तो ढल जाता है एक -एक करके सांचे में
बस वक्त के अदृश्य ढांचे में
और लेखनी को कर देता है बेजार
और रचनाकार हो उठता है बेक़रार
कभी उन्हीं शब्दों को कहता उदासी
बनकर जैसे हो कोई सन्यासी
ढूंढता अर्थ विरक्ति में
धर्म अथवा दर्शनविहीन भक्ति में
अवतरित शब्द ...
कभी जब नुपुर बनकर कहीं बजते
तो गीतों में प्रेम -संदेशों में जाकर सिमटते
भावविभोर हो पायल में जाकर टूट जाते
और वर्षा की बूंदों को तरसते चातक में मुंह में जाकर फूट जाते
खुले सीप में मोती बनकर प्रणय की अंगूठी में जड़ते
कभी विरह चट्टानों जैसे जड़ होकर राह में तड़पते
यही शब्द ...
शबनम में जाकर चुपचाप सो जाता
और परिंदों की चोंच में जाकर उजाले के बीज बोता
भोर की पहली किरण के रथ पर होता सवार
ले जाता रवि को पर्वत से उस पार
सायं को नायिका के प्रणय निवेदन के सुरों में खनकता
काजल सा आँखों में घुलता
मधुमास और मधुशाला में मध्य टहलता
प्यार और प्यास में बीच गमकता
वही शब्द ......
हर बार एक नया अर्थ खोजते
हर तर्क से नये विमर्श गढ़ते
विवश होते फूट पड़ने को
और नई कोंपलों जैसे नहा धोकर निखरते
मगर हर बार कविता बनकर
पुष्पित होते
फलित होते
और कवि के कंठ में मुस्काते
जैसे
भगवान शिव के गले में पड़े हो
माता पार्वती के हर जन्म के पड़े मुंड
प्रेम के प्रतीक स्वरुप अलभ्य और अखण्ड ..
**
रामकिशोर उपाध्याय
यह रचना आज सुबह से ही व्यग्र ही उतरने के लिए ...यह अमर कथा से प्रेरित है जो शिव भगवन ने माता पार्वती को सुनाई थी ..
21.4.2015

Wednesday, 5 December 2018

दिल में दीवारें लकड़ी की

सड़क पर पहुँचने के लिये 
पगडंडी छोड़नी पड़ी
पेड़ ,नदी, नाले और 
खेतों में फूलती सरसों छोड़नी पड़ी 
तितलियों के रंग और 
भौरों की गुंजन छोड़नी पड़ी
मधुमक्खी का शहद और
अमराई छोड़नी पड़ी
हवा में ठंड की खनक और
धूप की चमक छोड़नी पड़ी
और ,,,,,
धुंध में लिपटी सुबह और
शाम को सिसकती हिरनी मिली
पत्ते और पेड़ कटे छटे
और शाख पर घूमती चीटियाँ मिली
पानी का टैप और
दूध की मशीन मिली
कंक्रीट के घोंसले
और दिल की दीवारें लकड़ी की मिली
खुरदरी हथेली से
अब कैसे उनके कपोल सहलाऊँ
सोचता हूँ फिर से आदिम बन जाऊँ
*
रामकिशोर उपाध्याय