Tuesday, 31 July 2018

राजपथ


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सूखती रहे खेत में फसल
सूखती रहे माँ का वक्षस्थल
सत्ता की गाय को दुहते रहे अर्थकामी मध्यस्थ
धन्य है इस धरा का जनपथ .......
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सुमन की लुट रही सुगंध
वतन की टूट रही सौगंध
शासकों को उचित अब यही कि शूल उपवन के छाँट मत
यही है आधुनिक राजपथ ........
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धर्म की धुंधली होती रहे ज्योति
कृषक देते रहे नित्य प्राणाहुति
बीमे के राशि पर सत्ता मांग रही जनमत
धन्य है इस धरा का जनपथ .......
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कोख सूनी धरा की
पास पूंजी जरा सी
बढ़ते अपराध को भूख की वजह मान मत
यही है आधुनिक राजपथ ....
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दिवास्वप्न सब छल गये
गर्व के शिखर सब गल गये
भाषणों के चक्र पर ही चल रहा सत्ता का कीर्तिरथ
धन्य है इस धरा का जनपथ .......
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पुष्ट हाथ को काम मांग रहा नौजवान
हतशीर्ष सैनिक ढूंढ रहा स्वाभिमान
राष्ट्रों की कृत्रिम रेखा है मानव -शोणित से लथपथ
यही है आधुनिक राजपथ ....
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फडफडा रहा है खुली हवा में हर परिंदा
बिन जुबा के लाश में बदल रहे है जिन्दा
छोड़कर पगडंडियाँ, लपक रहा राज्य धन का वायुपथ
धन्य है इस धरा का जनपथ .......
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देह पर धारण है वस्त्र प्रभु का
कर तिरोहित अग्नि उदर की ,ध्यान हो रहा विभु का
प्यालों में देश ढल रहा ,इधर उधर देख मत
यही है आधुनिक राजपथ ....
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समता की क्रांति अब बुझ रही
डाह,प्रमीति धरा पर झुक रही
रक्त -रंजित है मानवता,मरणासन्न धम्म्पथ
धन्य है इस धरा का जनपथ .......
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बह रही है नदी स्वार्थ की
मिट रही है सदी परमार्थ की
अर्थ के अन्धमार्ग के अनुगमन से जीवन है प्रमथ
यही है आधुनिक राजपथ ....
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दंभ का हो तर्पण ,अहम का निष्क्रिय हो छद्म आवरण
सुबुद्धि करे वंचित का संभरण, शुद्ध हो धर्म का आचरण
तम मिटे ,उर खिले और मिटे क्रूर राजपथ
मिलकर करे जयघोष,ऐसा हो जनगण का जनपथ
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रामकिशोर उपाध्याय
31 जुलाई 2018

Monday, 15 January 2018

अहसासों की दुनियाँ में 
अधिकारों को रहने दो 
चुंधिया गई हैं आँखें तो 
अंधियारों को रहने दो 
मेरी वेदना को छोड़ों पर
सरोकारों को रहने दो
तुम निर्मम सत्ता हो पर
बेढंगे आकारों को रहने दो
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रामकिशोर उपाध्याय

Wednesday, 6 December 2017

आओ झोले से कुछ ख्वाब निकाले


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आओ झोले से
कुछ ख्वाब निकाले
चलो फिर दुखिया की ओर
कुछ मुस्कान उछाले
साँझ से पहले
बचाले दीप के उजाले
धूप की डिबिया में
रात का सारा  काजल छिपा ले
आओ झोले से
कुछ ख्वाब निकाले ..............
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रामकिशोर उपाध्याय

Saturday, 2 December 2017

बस एक ही शब्द #########


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यदि तू हां कहे 
तो जीत लूं धरती और पर्वत 
और बना लूं एक पर्ण कुटीर
जहाँ हम हो और हो मादक समीर
झूमती हर दिशा हो जाये कह-कह कर अधीर
बस एक ही शब्द
प्रेम .......
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गर तू हां कहे ........
तो लिख डालूं इस गगन पर
और भर दूँ काग़ज सारे कोरे -कोरे
ढूँढती रहे निशा चांदनी में जिसे चाँद के धोरे -धोरे
बस एक ही शब्द
प्रेम ....................
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रामकिशोर उपाध्या

अजीब शर्त

न वादे, न कसमें 
न वफ़ा, न जफ़ा 
न हम उन्हें बाँध पाए 
न वो आज़ाद रह पाए 
मिले तो मुकद्दर 
न मिले तो खली नहीं तन्हाई
मोहब्बत ने यह ताउम्र
कैसी अज़ीब शर्त निभाई
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रामकिशोर उपाध्याय

Sunday, 26 November 2017

यह तुम भी जानते हो ----------------------



यह तुम भी जानते हो 
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तुम्हारी दुआओं में कब
शामिल हुआ मेरा हिस्सा 
फकत तुम्हारी कालीन 
बनकर रह गया मेरा किस्सा 
जिसके नीचे खिसकाते रहे 
तुम मुझको हमेशा 
ये मेरा हौसला ही था 
जो वक्त की नमी पा 
बन गया बिरवा वट का 
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रामकिशोर उपाध्याय

Thursday, 29 June 2017

क्योंकि मैं साक्षी हूँ -------------------



जब आप दिखा रहे थे स्वरुप विराट 
कुछ समय के लिए मैं ढूंढ रहा था ठाट 
जब आप मुख में लिए थे ब्रह्माण्ड
हे कृष्ण ! उस समय मन हो रहा था खंड-खंड
क्यों सखे ?
आप उस दिन आज दिखा रहे थे ,,
मैं आज (जो आपका कल था ) को देख रहा था
सच ,जो देख रहा था कह नही सकता
अब तो प्रभु आप भी उसे गीता में नहीं उद्धृत कर सकते
तुमने कहा था हम सब धर्म के लिए मरे और जिए
मगर यहाँ आदमी अधर्म के लिए मर और जी रहा है
क्या यहीं आधुनिक अर्थ है तुम्हारे कहे 700 श्लोकों का 
क्या इस मानव का यही युगधर्म है ?
उस दिन कम था परन्तु आज मैं बहुत अधिक हूँ किंकर्तव्यविमूढ़  
आज भी युद्ध के लिए होना चाहता हूँ आरूढ़
मगर आज मेरे रथ के पहिये धंस गये हैं
कर्म में नही कर्मकांड में फंस गये हैं
अब और युद्ध नही ...
समय के दुर्योधन को संधि -पत्र लिख रहा हूँ
इतिहास इसे मेरी निष्क्रियता अवश्य कहेगा
हे अर्जुन !
मैं तुमसे सहमत हूँ उदास मत हो.....
यह न कुरुक्षेत्र है और न धर्मक्षेत्र
यहाँ की गीता में प्रमुख है ''राज योग ''  
इसलिए  तू कुर्सी के लिए गठजोड़ कर  
और शेष मुझपर छोड़ दे ...
मैं सदैव दोषमुक्त रहा हूँ
क्योंकि मैं साक्षी था ...हूँ .......... और रहूँगा

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रामकिशोर उपाध्याय