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यदि तू हां कहे
तो जीत लूं धरती और पर्वत
और बना लूं एक पर्ण कुटीर
जहाँ हम हो और हो मादक समीर
झूमती हर दिशा हो जाये कह-कह कर अधीर
बस एक ही शब्द
प्रेम .......
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गर तू हां कहे ........
तो लिख डालूं इस गगन पर
और भर दूँ काग़ज सारे कोरे -कोरे
ढूँढती रहे निशा चांदनी में जिसे चाँद के धोरे -धोरे
बस एक ही शब्द
प्रेम ....................
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रामकिशोर उपाध्या
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (04-12-2017) को "शुभ प्रभात" (चर्चा अंक-2807) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
बहुत सुन्दर रचना ..
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