Sunday, 26 November 2017
Thursday, 29 June 2017
क्योंकि मैं साक्षी हूँ -------------------
कुछ समय के लिए मैं ढूंढ रहा था ठाट
जब आप मुख में लिए थे ब्रह्माण्ड
हे कृष्ण ! उस समय मन हो रहा था खंड-खंड
क्यों सखे ?
आप उस दिन आज दिखा रहे थे ,,
मैं आज (जो आपका कल था ) को देख रहा था
सच ,जो देख रहा था कह नही सकता
अब तो प्रभु आप भी उसे गीता में नहीं उद्धृत कर सकते
तुमने कहा था हम सब धर्म के लिए मरे और जिए
मगर यहाँ आदमी अधर्म के लिए मर और जी रहा है
क्या यहीं आधुनिक अर्थ है तुम्हारे कहे 700 श्लोकों का
क्या इस मानव का यही युगधर्म है ?
उस दिन कम था परन्तु आज मैं बहुत अधिक हूँ किंकर्तव्यविमूढ़
आज भी युद्ध के लिए होना चाहता हूँ आरूढ़
मगर आज मेरे रथ के पहिये धंस गये हैं
कर्म में नही कर्मकांड में फंस गये हैं
अब और युद्ध नही ...
समय के दुर्योधन को संधि -पत्र लिख रहा हूँ
यहाँ की गीता में प्रमुख है ''राज योग ''
*
रामकिशोर उपाध्याय
Wednesday, 21 June 2017
मध्यान्ह का सूर्य
एमध्यान्ह का सूर्य
एक दिन दोपहर मिली
बड़ी बुझी -बुझी
अपने ही कन्धों पर झुकी -झुकी
ऐसा क्यों ?
उसे उसके सारथी ने ही छला था
क्या करती ..
धूप के लूटने का डर था
सूरज की आँखों में जीने का रक्तिम समर था
फूलों के पथ में बिछे थे अंगारे
नभ में घोड़ों को मिले नही चाँद, न थे कहीं सितारे
और रौशनी को आँखों में भींच लिया
किसी ने पेड़ की ठूंठ के साथ पाँव बाँध दिये
*
रामकिशोर उपाध्याय
Thursday, 18 May 2017
कृष्ण और यशोदा सम्वाद
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देख ले माँ ..
मुख में मेरे ब्रह्माण्ड है .....
यह नहीं मिटटी का गोला
इसमें भरे जय (महाभारत) के सभी काण्ड हैं
यहाँ सभी जीवों में वही तेरा गोपाल है
संग में खड़ी गैया नहीं
ये मेरी इन्द्रियां विशाल है
रम रहा हूँ योग मैं ...
कर रहा हूँ भोग मैं ......
यह नही कोई विरोधाभास है
यही तो सत्य का प्रकाश है
मैं रहता हूँ जगत में
लिप्त भी
निर्लिप्त भी
ये बाल सखा जो है मेरे
ये आत्माएं है जो मुझे है घेरे
देख ले माँ......
हूँ वही तेरा नन्हा सा दिया
आकर पालन विष्णु के आदेश का कर दिया
कभी कालिया को मारूंगा
कभी गोवर्धन को धारूंगा
कभी कंस की करूँगा हत्या
पर युद्ध में भी धर्म का रहूँगा सत्या
बन जाऊँगा अर्जुन का सखा
सदा हरूँगा जग की व्यथा
मैं अब जान गयी ,वत्स.............
जग का अब होने वाला है उत्स
मेरे देख रहे हैं नेत्र
तू तो सत्य का ही है मित्र
तू ही त्रिनेत्रधारी
तू ही चक्रपाणी
कहूँगी उससे जो है तेरा बाबा नन्द
कि लाला हमारा,बच्चा नही,है प्रभु का अमित आनंद
बस अब यह लीला मत दिखा
जा खेल और जग को खेल खिला
तू कितनी प्यारी है माँ .....
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रामकिशोर उपाध्याय
Saturday, 13 May 2017
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सोई रात का
पड़ता जब जीवन से साबका
शबनम को गगरी में लेने
चल पड़ती हैं किरणें पनघट की ओर
कुनबे की प्यास बुझाने
लखता उसे सूरज बनकर चितचोर
तब होती है भोर ..........
अलसाये सपने
आँखों में लगे चुभने
स्लेट पट्टी बन जाए अम्बर
उडान की चाहत लगे बढ़ने
और लक्ष्य को देख जब मन में नाचे मोर
तब होती है भोर
*
रामकिशोर उपाध्याय
Wednesday, 10 May 2017
परिचय
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परिचय पवन का ....
उड़ते सूखे पत्ते और गुजरती आँधियां
खुशबू का अस्तित्व.....
उपवन के मध्य में अलौकिक अनुभूति
स्पर्श का प्रभाव .....
किसी पुष्प से हाथ मिला लेना
इतने अनभिज्ञ तो नहीं हैं आप !
फिर क्यों जानना चाहते हो मेरी पहचान
वही हाड-मांस का मिटटी का एक पुतला -इन्सान
धूप में जलता श्रमिक,
अपने लक्ष्य की यात्रा पर पथिक
समय से सीखता प्रशिक्षु
बुद्ध की तरह ज्ञान - भिक्षु
और व्यथित चितेरा.....
जीवन के रंगों का जिन्हें लेखनी से बिखेरा
क्या किसी से करते हो प्रेम ?
कभी किसी कीे मीची हैं ऑंखें ?
क्या झाँक कर देखा है किसी का मन ?
यदि हां ..............तो
वो अंतर्मन में महकती सुगंध
वो स्वेद की गंध
और स्निग्ध स्पर्श का अनुभव
वही सूक्ष्म,जितना स्थूल ..
जितना अधिक बद्ध ,,उससे अधिक मुक्त
‘मैं’ ही तो हूँ ......
हां ,मैं ही तो हूँ ........................
तुम्हारा अपना .........
*
रामकिशोर उपाध्याय