Thursday, 5 April 2012

सलीब खुद के कांधें पर आज भी


उठा कर चल रहा हॅू मैं

सलीब खुद के कांधें पर आज भी --

ठुकी हैं कीले

मेरे जिस्म में आज भी--

गर एक भी आंसू आंख के किसी कोने मे आया

तो जमाना रो पडेगा

यह जानकर मैं रोता नही

कर रहा हॅू प्रार्थना

हे पिता !

क्षमा कर दो उन्हे

वे जानते नही वे क्या कर रहे हैं

सह रहा हॅू दर्द बडी़ खामोशी से --

कि वह उतर लाये मानवता के सीने में

करुणा बनके

प्रेम बनके

और उभर आये मुस्कान बनके

उसके चेहरे पर

जो कभी हंसा ही नही

जाति की चिट़ठी

 
अपनी खुशी से चमन में कलियां कहां खिलती हैं ,
यहां तो खुदा से ज्यादा बागवां की मरजी चाहिये ।

अपनी जिद से वतन में खुशियां कहां मिलती हैं,
यहां तो जज्बात से उपर सिरो की गिनती चाहिये ।

अपनी फिक्र से नफरत की दीवार कहां गिरती हैं,
यहां तो बातों से ज्यादा दिलो की गरमी  चाहिये।

अपनी खुदी के बूते ही मंजिल  कहां मिलती हैं,
यहां काबिलियत को भी जाति की चिट़ठी चाहिये ।


Saturday, 24 March 2012




विश्वास का बरगद.
banyan tree 

विश्वास की गहराई
इतनी गहरी जैसे बरगद की जड़े 
विश्वास का प्रभाव
इतना घना जैसे बरगद की छाँव
विश्वास का रिश्ता
इतना सशक्त जैसे बरगद की शाखाएं
विश्वास पर आघात 
इतना भयावह  जैसे बरगद  का  जड़ सहित उखड़ना.

Friday, 23 March 2012

दिन में रात


सूरज

पूछ रहा था खुद से ही कि क्यों दिन में रात हुई -

ना ही कोई आंधी चली

ना ही कोई उठी बदली

नभ पर अजब सी हलचल हुई

सितारें आसमान की गठरी से निकल चांद को ढूंढने लगे

और चांद खुद सूखे पेड पर जा छिपा

उल्लू कोटरे से बाहर झांकने लगे

सियार अपने शिकार को निकलने लगे

बिल्लिंया मुंह उठाने लगी

कुत्ते सोने के लिए ओंट ढूंढने  लगे

सूरज की बेचैनी बढ चली

अपने सातों घोडों को रथ में  जोतने   को ही था -

देखा कि रति ने विरह में चेहरे पर

लटांए फैलाकर आसमान को ताका था.

Monday, 6 February 2012

प्रेम का परिमाण



 
हो कितना प्रेम का
परिमाण-
भावनाओं की उफनती नदी में
बिना किश्ती व पतवार के उतरजाना
डूब कर लगा लेना जल समाधि-
पाल लेना एक लाईलाज व्याधि-

या
फिर उफनते ज्वार को 
सिर्फ पोरूओं से स्पर्श करना
भावनाओं की गहराई में डूबने के  भय से  
उथले तर्को से करना तिरस्कार

प्रेम का नही होता हैं परिमाण----
प्रेम का होता हैं सिर्फ परिणाम---

Thursday, 2 February 2012

ये आंखे

   

क्या कहना चाह रही हैं
ये आंखे -

काला काला काजल भरकर
समन्दर सी गहराई में
क्या प्रियतम को छुपाना चाह रही हैं
 ये आंखे -

सतरंगी दुनिया का ताना बाना बुनती
भरा प्रेम का गागर
बस छलक जाना ही चाह रही हैं
ये आंखे-

अधरो पर जनम जनम की प्यास सजायें
लगी अगन प्रेम की 
क्या खुद को ही जलाना चाह  रही हैं
ये आंखे-

बेकरार हैं दिल
पर न देंगे सहजता से
क्या इसी भ्रम को बनाए रखना चाह रही हैं
ये आंखे-

कानों मे लटके बुंदे उलझे हैं लटो से
कर दे रहे हैं भ्रमर का स्वागत
पर लाज की अभिव्यक्ति करना ही चाह  रही हैं
ये आंखे-

अपूर्व सोंदर्यमयी किसको देना चाह रही हैं ये गुलाब
मैं ही हूं वही लाजवाब
क्या यही कहना चाह रही हैं
ये आंखे ।

Tuesday, 31 January 2012

अजन्मे संबन्ध








हमारे जीवन में
सभी कुछ  का जन्म नही होता हैं
किसी की कोख से
पर
कभी-कभार मान्यताओं का जन्म होता हैं
आम पर पीपल के वृक्ष की भांति
जो उगती ही वरन् सहयात्रा भी करती हैं
क्षणिक सुख और शाश्वत दु:ख की , अन्त की