Thursday, 24 October 2013
खुश्क समंदर
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बेशक तुझे बहुत गुस्सा सताये,
मुस्कान सजा के होठों पर रख.
बेशक सच्चा हो अपना किस्सा,
बेगुनाही आँखों में डालकर रख.
ये दुनिया चले अपनी चाल से,
किसी पांव पे*सर लगाकर रख.
वक़्त घड़ी जब ठीक न हो तेरी,
दोस्त की सुई से मिलाकर रख.
आये जब अश्क अपनी आंख में
छिपाने को काजल लगाकर रख.
रामकिशोर उपाध्याय
24.10.2013
Tuesday, 22 October 2013
एकल काव्य पाठ --- एक साहित्य मंच
"शीर्षक अभिव्यक्ति" (उन्वान ) --- 79 (चित्र) दिए गए चित्र पर एक विनम्र प्रस्तुति
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काल का पक्षी
बहुत बांधा
तुम्हे
बहुत घोटा गला
तुम्हारा
कि तुम न चीख सको
कि तुम न उड़ सको
कई बार मैंने तुम्हारे पर काट डाले
कई बार तुम्हे कालकूट दिया
फिर भी न कट सके
फिर भी न मर सके
तुम तो जैसे पीयूष पीकर आये थे
समुद्र मंथन के अवसर
और खुद ही बंट गए
घडी में
पल में
संवत में
युग में
मैं मानव हूँ
मैंने बहुतों को जन्म दिया
मेरी जिज्ञासा के समक्ष
प्रकृति भी कई बार नतमस्तक हुयी
जब मैं अकर्मण्य रहा
और समझता रहा
कि मैं तुम्हे काट रहा हूँ
परन्तु वास्तव में तुम ही मुझे काट रहे थे
मैं तुम्हे बांध नहीं सकता
और बाधने इस भ्रम में जी नहीं सकता
तुम ही सत्य हो
और
परिवर्तन चक्र
चलाते रहो
प्रकृति की नित्यता हेतु
हे नियंता !
काल........
उड़ते रहे हो
उड़ते रहों एक पक्षीसम
अनंत में और अंत तक ---------
रामकिशोर उपाध्याय
22.10.2013
"शीर्षक अभिव्यक्ति" (उन्वान ) --- 79 (चित्र) दिए गए चित्र पर एक विनम्र प्रस्तुति
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काल का पक्षी
बहुत बांधा
तुम्हे
बहुत घोटा गला
तुम्हारा
कि तुम न चीख सको
कि तुम न उड़ सको
कई बार मैंने तुम्हारे पर काट डाले
कई बार तुम्हे कालकूट दिया
फिर भी न कट सके
फिर भी न मर सके
तुम तो जैसे पीयूष पीकर आये थे
समुद्र मंथन के अवसर
और खुद ही बंट गए
घडी में
पल में
संवत में
युग में
मैं मानव हूँ
मैंने बहुतों को जन्म दिया
मेरी जिज्ञासा के समक्ष
प्रकृति भी कई बार नतमस्तक हुयी
जब मैं अकर्मण्य रहा
और समझता रहा
कि मैं तुम्हे काट रहा हूँ
परन्तु वास्तव में तुम ही मुझे काट रहे थे
मैं तुम्हे बांध नहीं सकता
और बाधने इस भ्रम में जी नहीं सकता
तुम ही सत्य हो
और
परिवर्तन चक्र
चलाते रहो
प्रकृति की नित्यता हेतु
हे नियंता !
काल........
उड़ते रहे हो
उड़ते रहों एक पक्षीसम
अनंत में और अंत तक ---------
रामकिशोर उपाध्याय
22.10.2013
बस तुम आ जाना
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मैं आज
खिल उठी हूँ महकने के लिए,
एक फूल बनकर
कल रात ही
मैंने अपने हाथों पर मेहंदी लगाई हैं
जो आज उभर आई है
गहरे लाल में मेरे विश्वास की भांति
आज मैंने सूरज से किरने उधार ली है
अपनी कटिमेखला के लिए
अवनि से अमावस मांगी
अंजन के लिए
पारिजात से पुष्प मांगे हैं
कानों के स्वर्णफूल हेतु
वेणी के लिए
चंपा और चमेली को रिझाया हैं
मांगी हैं ओस से नमी
उन कुछ पलों में
देह की स्निग्धता के लिए
हल्दी और चन्दन से
शुद्धता और निरोगता की प्रार्थना की
अप्सरा से सौन्दर्य
और मेनका से रिझाना लिया
भावों की धरा हैं
बस एक प्यास रह गयी हैं
उसके लिए सलिल के सामने नहीं झुकुंगी
अब बस तुम आ जाना
बालचन्द्र के उदय के साथ
स्पर्श का
अवदान देना हैं आपको ....
मेरी तृप्ति का अहसास ....
मेरी संतृप्ति का अहसास
रामकिशोर उपाध्याय
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मैं आज
खिल उठी हूँ महकने के लिए,
एक फूल बनकर
कल रात ही
मैंने अपने हाथों पर मेहंदी लगाई हैं
जो आज उभर आई है
गहरे लाल में मेरे विश्वास की भांति
आज मैंने सूरज से किरने उधार ली है
अपनी कटिमेखला के लिए
अवनि से अमावस मांगी
अंजन के लिए
पारिजात से पुष्प मांगे हैं
कानों के स्वर्णफूल हेतु
वेणी के लिए
चंपा और चमेली को रिझाया हैं
मांगी हैं ओस से नमी
उन कुछ पलों में
देह की स्निग्धता के लिए
हल्दी और चन्दन से
शुद्धता और निरोगता की प्रार्थना की
अप्सरा से सौन्दर्य
और मेनका से रिझाना लिया
भावों की धरा हैं
बस एक प्यास रह गयी हैं
उसके लिए सलिल के सामने नहीं झुकुंगी
अब बस तुम आ जाना
बालचन्द्र के उदय के साथ
स्पर्श का
अवदान देना हैं आपको ....
मेरी तृप्ति का अहसास ....
मेरी संतृप्ति का अहसास
रामकिशोर उपाध्याय
Monday, 21 October 2013
कोई हैं यहाँ
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खड़ा हूँ
बांस के जंगल में
प्रेम अधरों पे लिए पर
कोई बांसुरी नहीं मिल रही
शब्द भी हैं
सजे-सजे से पर
कोई कहानी नहीं मिल रही
आंख भी है
लाल-लाल सी पर
कोई निशानी नहीं मिल रही
हूँ खड़ा
एक मीनार पे
उगा-उगा सा पर
कोई जमीं नहीं मिल रही
अश्क हैं
थमे-थमे से पर
कोई रवानी नहीं मिल रही
तुम खड़े हो
पास-पास से पर
कोई दीवानी नहीं मिल रही
रामकिशोर उपाध्याय
21.10.2014
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