Saturday, 31 August 2013
Friday, 30 August 2013
*बस जनाब !!
दिल लिया हैं तो जज्बात भी लीजिये ,
बदले हुए दिल के हालात भी लीजिये।
मुद्दतों से नम हैं चश्म तुम्हारी याद में ,
आके अब थाम ये बरसात भी लीजिये ।
करते हैं तस्लीम तुम्हारी दयानतदारी ,
तो फिर वफ़ा की सौगात भी दीजिये ।
नहीं आसान होता बिगड़ी बात बनाना ,
अब नफरत के ख़यालात भी छोडिये ।
बहुत हो गया हैं हुकूमत का मुजाहिरा ,
तो अब हमारी खिदमात भी कीजिये।
लम्बे अरसे तक परखा ये वज़ूद हमारा ,
दिखा अब अपनी औकात भी दीजिये ।
रामकिशोर उपाध्याय
दिल लिया हैं तो जज्बात भी लीजिये ,
बदले हुए दिल के हालात भी लीजिये।
मुद्दतों से नम हैं चश्म तुम्हारी याद में ,
आके अब थाम ये बरसात भी लीजिये ।
करते हैं तस्लीम तुम्हारी दयानतदारी ,
तो फिर वफ़ा की सौगात भी दीजिये ।
नहीं आसान होता बिगड़ी बात बनाना ,
अब नफरत के ख़यालात भी छोडिये ।
बहुत हो गया हैं हुकूमत का मुजाहिरा ,
तो अब हमारी खिदमात भी कीजिये।
लम्बे अरसे तक परखा ये वज़ूद हमारा ,
दिखा अब अपनी औकात भी दीजिये ।
रामकिशोर उपाध्याय
Thursday, 29 August 2013
Wednesday, 28 August 2013
जय श्री कृष्णा
आज श्री कृष्ण जन्माष्टमी
1.
धर्म व कर्म
फलाकंक्षा रहित
सोलह कला
२.
काम व मोक्ष
सम्पूर्णता विशाल
हैं अविजित
3.
ईश भी सखा
विनाश भी विकास
श्याम तू श्वेत
Ramkishore Upadhyay
आज श्री कृष्ण जन्माष्टमी
1.
धर्म व कर्म
फलाकंक्षा रहित
सोलह कला
२.
काम व मोक्ष
सम्पूर्णता विशाल
हैं अविजित
3.
ईश भी सखा
विनाश भी विकास
श्याम तू श्वेत
Ramkishore Upadhyay
काव्य प्रतियोगिता :२ (शीर्षक: भादो, बरसात और बाढ़)
एक विनम्र प्रस्तुति ;;;;;;;;;;;;;;;;;;
बरसात
-------
मत बरसना बदरा मेरे गाँव में अबकी बार
टूटी मेरी छपरिया,,,अभी पड़े खाली कुठार
अरे निष्ठुर !पिछले बरस जब आये तुम
बह गयी फसल हमारी, डूबे घर और द्वार
जब भी आते हों लाते संग विपत्ति हज़ार
धीरे बहती नदिया तब करती तेज फुन्कार
पेड़ भी टूटे,तट भी टूटे,बिलखे बाल बछड़े
लुगाई रोवे हैं जलावे गीली लकड़ी बार बार
उतना ही बरसना भर जाये धरा की झोली
कोई न सोये भूखा,ना हो बाढ़ का हाहाकार
रामकिशोर उपाध्याय
२८/०८/२०१३
एक विनम्र प्रस्तुति ;;;;;;;;;;;;;;;;;;
बरसात
-------
मत बरसना बदरा मेरे गाँव में अबकी बार
टूटी मेरी छपरिया,,,अभी पड़े खाली कुठार
अरे निष्ठुर !पिछले बरस जब आये तुम
बह गयी फसल हमारी, डूबे घर और द्वार
जब भी आते हों लाते संग विपत्ति हज़ार
धीरे बहती नदिया तब करती तेज फुन्कार
पेड़ भी टूटे,तट भी टूटे,बिलखे बाल बछड़े
लुगाई रोवे हैं जलावे गीली लकड़ी बार बार
उतना ही बरसना भर जाये धरा की झोली
कोई न सोये भूखा,ना हो बाढ़ का हाहाकार
रामकिशोर उपाध्याय
२८/०८/२०१३
Tuesday, 27 August 2013
वापस तो नहीं लौट जाओगे ?
---------------------------
कल रात
मैं अँधेरे में
चल रहा था
एक आहट हुयी
पलट कर देखा तो
कोई नहीं था
फिर साथ -साथ चलने
का आभास हुआ
फिर मुड के देखा
तो कोई बुदबुदाया
मैं घबराया
वह जोर से चिल्लाया
अरे पहचानते नहीं
मैं हूँ तुम्हारा साया,,,,,
मेरा साया ,,,
मैं बरसों से साथ तो हूँ
मैंने तो नहीं देखा
कभी मिले भी नहीं
मिलते कैसे ?
तुम तो दुनिया को देखते रहे
सपनों में जीते रहे
कामयाब होने के जुगाड़ में लगे रहते हो
फेल होने से डरते हो
दौड़ते रहे हो अबतक --
फिर मैं कैसे मिलता तुम्हे
आज भी
तुम्हे इसलिए मिलगया
कि तुम महज अपने बारे में सोच रहे थे
चकाचौध से निकल के
अँधेरे में चहल कदमी कर रहे थे
मैं तभी मिलता हूँ
जब बाहर अंधेरा हो
मैं अन्दर का दीपक हूँ
ब्रह्म जोत से जलता हूँ
अब तुम
वापस तो नहीं लौट जाओगे ?
नहीं तो मैं ये चला,,,,,,,,,,,,,
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कल रात
मैं अँधेरे में
चल रहा था
एक आहट हुयी
पलट कर देखा तो
कोई नहीं था
फिर साथ -साथ चलने
का आभास हुआ
फिर मुड के देखा
तो कोई बुदबुदाया
मैं घबराया
वह जोर से चिल्लाया
अरे पहचानते नहीं
मैं हूँ तुम्हारा साया,,,,,
मेरा साया ,,,
मैं बरसों से साथ तो हूँ
मैंने तो नहीं देखा
कभी मिले भी नहीं
मिलते कैसे ?
तुम तो दुनिया को देखते रहे
सपनों में जीते रहे
कामयाब होने के जुगाड़ में लगे रहते हो
फेल होने से डरते हो
दौड़ते रहे हो अबतक --
फिर मैं कैसे मिलता तुम्हे
आज भी
तुम्हे इसलिए मिलगया
कि तुम महज अपने बारे में सोच रहे थे
चकाचौध से निकल के
अँधेरे में चहल कदमी कर रहे थे
मैं तभी मिलता हूँ
जब बाहर अंधेरा हो
मैं अन्दर का दीपक हूँ
ब्रह्म जोत से जलता हूँ
अब तुम
वापस तो नहीं लौट जाओगे ?
नहीं तो मैं ये चला,,,,,,,,,,,,,
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