Tuesday, 30 July 2013

मगर बहाना नहीं मिला


सजदे  कर लिए है 
मगर ठिकाना नहीं मिला (१)

होठों पे तबस्सुम हैं
मगर सहारा नहीं मिला (२)

मौज़ो से उलझते हैं 
मगर किनारा नहीं मिला (३)

दिल तो लुटा बैठे हैं
मगर इशारा नहीं मिला (४)

आंखे तो चुरा  ली हैं 
मगर शरारा नही मिला (५) 

जीने की तमन्ना हैं
मगर बहाना नहीं मिला (६)

रामकिशोर उपाध्याय




आखिर
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आखिर वो इल्तिजा कौन करे
ये दर्द-ए-इश्क बयां कौन करे
हम दिल चाक कराके बैठे  हैं
हर जख्म की दवा  कौन करे
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रामकिशोर उपाध्याय 

Sunday, 28 July 2013

ऐतरेय उपनिषद से :

ॐ आत्मा वा इकमेव एवाग्र आसीत|नान्यत्किंचन मिषत |स ईक्षत लोकान्नुसृजाइति |
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ॐ इस परमात्मा के नाम का उच्चारण करके उपनिषद का आरम्भ करते है. यह जगत प्रकट होने से पूर्व एक मात्र परमात्मा या अन्य कोई चेष्टा करने वाला नहीं था . उस परम पुरुष परमात्मा ने निश्चय किया कि 'मैं प्राणियों के कर्म फल भोगार्थ भिन्न -भिन्न लोको की रचना करूँ '.

मित्रों , चिंतन करे और मार्गदर्शन भी !

रामकिशोर उपाध्याय

ॐ। ।

ताभ्य पुरुषमानयत्ता अब्रुवन सुकृतंवतेति।
पुरुषों वाव सुकृतमं।ता अब्रवीद्यथायतनं प्रविशतेति।।    

तब परमात्मा (गाय और घोड़े के शरीर देवताओं को रहने के लिए बनाने के बाद, जिसे देवताओं ने यथेष्ट नहीं समझा),मनुष्य का शरीर लाये। वे देवता बोले यह बहुत सुन्दर बन गया। सचमुच मनुष्य शरीर परमात्मा की सुन्दर रचना हैं। उन देवताओं से कहा कि तुम लोग अपने- अपने योग्य आश्रयों में प्रविष्ट हो जाओं।    
आपकी सुवास  
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आती -जाती  सांस में विश्वास हैं 
प्रकट विश्वास में प्रभु का वास हैं 
क्यों फिरूं नित नव वन उपवन  
जब दिगदिगंत आपकी सुवास हैं

चक्षुओं में लहराता करुणा सागर
अंक छिपा जाता कष्ट का गागर
नव चेतना  करती मेरा आव्हान 
जब ह्रदय में प्रेम का उच्छ्वास हैं   
  
हर  स्पंदन है  साक्ष्य जीवन का 
हर किरण हैं साक्ष्य अंधकार का
आ रही हैं तरंग सूक्ष्म आधार से  
आनंद दीप जले उर में मिठास हैं 

(c) रामकिशोर उपाध्याय    


Saturday, 27 July 2013


चल बढ़ और देख क्या हैं ये जिंदगी के मसाइल
पहले भी तीन डग में नप चुकी हैं तमाम दुनिया

रामकिशोर उपाध्याय 
मेरी कविता 


जिसे ढूंढता हूँ 
सपनों की परछाई में 

जिसे खोजता हूँ 
सागर को गहराई में 

जिसे पाता  हूँ 
दहकते पलाश की ललाई  में 

जिसे देख बहता हूँ 
कल -कल करती नदी की अंगड़ाई में 

कौन हो तुम ?
कौन हो तुम ?

कही तुम 
झर-झर बहता झरना तो नहीं 

कही तुम 
गुनगुनाता मधुप तो नहीं 

कही तुम 
अधरों पे टिकी कृष्ण की बांसुरी तो नहीं 

कही तुम 
फूल फूल कूदती तितली तो नहीं 

कही तुम 
झूम झूम गाती बयार तो नहीं 

कही तुम 
आशा के उजाले में लिपटी सुबह  तो नहीं 

कही तुम 
मंजिल से भटकी डगर तो  नहीं 

कही तुम 
ग़म में डूबी शाम तो नहीं 

कही तुम 
प्रतीक्षारत पत्नी तो नहीं 

कही तुम 
मनुहार कराती प्रेमिका तो नहीं 

मुझे तो लगता हैं  तुम सब कुछ हों 
जीवन की लय 
आदि और प्रलय
विस्तृत नभ 
अनंत सागर 
दिन-प्रतिदिन का ज्वार 
हरी भरी धरती 
बंजर और परती
अपना दर्द विस्मृत 
परहित विस्तृत 
बिना जूती
जग जंगल में भटकती 
पाने को नवत्राण  
पोषित करता स्वप्राण    
झूलती लता 
फूलती कली 
लहरों पे चल नंगे पांव 
छूता नए पुराने गाँव 
ना बहर का ख्याल 
ना नुक्ते का सवाल 
बस भाव ही मीत 
व्यक्त होता गीत 
ना याद रखता  छंद की मात्रा 
शब्दों की एक अंतहीन यात्रा
बस
शब्दों की एक अंतहीन यात्रा  

(C) रामकिशोर  उपाध्याय 

Friday, 26 July 2013

मेरा ख़त ----------












ख़त ना मिला हो तो भी मिलने का इज़हार करना 
जिगर के खून से लिखा गया हैं बस आता ही होगा  

गहरे रंग से सरोबार हैं मेरे जज़बात के अल्फाज़
पहले पैगाम भेजा हैं दिल भी अब आता ही होगा 

ना जला देना बड़ी मुश्किल से आये  हैं  लब तक 
दिन ढल गया शब-ए-वस्ल बस भी आता ही होगा  
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रामकिशोर उपाध्याय