Sunday, 31 July 2022

विचार प्रवाह : जीवन-संध्या का मुकाबला ********

सांझ के धुंधलके में कुछ साफ नहीं दिखाई देता और वस्तुओं को ठीक -ठीक देखने के लिये आदमी  या तो  आंखों को मलता है या फिर ऐनक को  ऊपर नीच करता है या बार- बार उसके लेंस  साफ करता है।विज्ञान के अनुसार यह प्रकाश की अल्पता के कारण होता है। वस्तुएं तो अंधेरा हो या उजाला हो, एक जैसी ही रहती हैं । ठीक वैसा  ही आलम ज़िंदगी की शाम का भी होता है और यह धुंधलका  उस समय और गहराने लगता है जब आपका साथ आपका ही जीवन- साथी छोड़ जाए।

जैसे वृक्ष की लम्बी तगड़ी जड़ें उसे मरने नहीं देती, वैसे ही  आदमी के जीवन का प्रकाश उसका परिवार होता है जो उसे संध्या बेला में जीने का सहारा दे भी सकता है और छीन भी सकता  है। मनुष्य को एक जीवन उसके विचार भी देते हैं । वृक्ष की नियति तो स्थावर बने रहने की है,लेकिन मनुष्य की नियति तो जंगम है। उसे तो नदी की तरह प्रवाहमान रहना है। जब वृक्ष अपनी जड़ों की लंबाई बढ़ाकर जल-प्रवाह को तलाश लेते हैं और अपनी जाइलेम और फ्लोएम को साल दर साल जिंदा रखते हैं तो मनुष्य भी क्यों न अपने विचारों को विस्तारित करके जीने के लिये  आवश्यक पोषण प्राप्त करे ? यह अधिकांश लोगों के साथ होता है  कि विभिन्न स्पष्ट या अस्पष्ट कारणों से परिवार अक्सर सांध्य बेला में  साथ छोड़ देता है ,तब आपके विचार और सोच ही जीने का हौसला देते हैं। वर्तमान परिस्थितियों का मुकाबला उनके प्रति  दृष्टिकोण को बदलकर और नकारात्मकता को हटाकर ही किया जा सकता है।  वैसे  बूढ़े वृक्ष पर तो न तो परिन्दें बैठते हैं और फल- फूल न आने की वजह से न मधुमक्खियां आती हैं और न ही भँवरे डोलते हैं और न ही तितलियां उस पर मंडराती हैं। यह प्रकृति का नियम है।अतः इस सत्य को स्वीकारते हुए कि सुबह के बाद शाम तो आनी ही है, चिंता छोड़कर  चिन्तनशील बने रहें ।

*

रामकिशोर उपाध्याय


Monday, 23 August 2021

हायकु

 1.

सकूरा पुष्प

बसन्त आगमन

विश्व मुदित

2*

सकूरा पुष्प

संस्कृति भी महान

जापानी जादू

3*

ख़ुशी संचार

रंगों की है बहार

भिन्न प्रकार

4*

पेड़ हैं लदे

सुन्दरता का दर्प

झूमी धरती

5*

सकूरा दृष्ट

सभी हैं मदमस्त

मृदंग व्यस्त

6*

भूमि महान

लुटता है किसान

जीना मुहाल

7*

झाड़ू है चोखा

किसान का है धोखा

भोपूं है चीखा

8*

सत्ता नाटक

लाश पे सियासत

नज़र वोट  

9*

है  बदलाव
सर्दी की ठिठुरन 
बर्फ  अलाव
10*

 नया जुगाड़
 घोडा चलता  पीछे
टमटम के  

11*

होती बरखा
पतझड़ के बाद
नया मौसम .
12*
आज की सत्ता 
नेता बनता  स्वार्थी
प्रजा बाराती .
13*
शासन मौन
जनता पलायन
है सुशासन

14*

लोकसेवक
मिथ्या ही पहचान
माया गबन

15*

जीवनलता

पुष्प- फल असंख्य

सीमित प्राप्ति

16*

मदन मस्त

प्रेमलता व्याकुल

वर्जना बाधा

17*

अश्रु की धार

जगत अत्याचार

प्रेम लाचार

*

रामकिशोर उपाध्याय


Monday, 15 March 2021

वो कौन थी ? ----------

 

न तो उससे पहले मिला था
न शायद फिर कभी मिलूँगा
मगर उसकी देह को स्पर्शकर
आया था सुगंध का इक झोंका .........

वो शायद मत्स्यगंधा थी
मेनका थी या फिर रम्भा थी
वो प्रेम सरोवरों में पम्पा थी
वो कामदेव की प्रिय चंपा थी ............

वो कोयल की कूक थी
वो मन की अनकही भूक थी
किसी बहती नदी का पानी थी
सागर की लहरों की रवानी थी ..........

वों स्वप्न सरीखा परिंदा थी
जो दिन के उजालों में भी जिंदा थी
जिस्म में वो धडकन थी
उम्र में वो यौवन और बचपन थी ....

वो नाम न पहले सुना था
और न कहीं लिखा होगा
न किताबों में किस्सा थी
वो तो कल्पना का हिस्सा थी ....

वो कौन थी ?
न आँधी और न गुम हवा थी
वो मेरे हर दर्द की दवा थी
वो सन्नाटे में चीखता मेरा मौन थी .........
*
रामकिशोर उपाध्याय

Thursday, 18 February 2021

आदमी और पत्थर

चित्र गूगल से साभार )


राह चलते- चलते

अनेक पत्थर मिलते हैं
कहीं धूप में तपते
तो कहीं चांदनी को तरसते
कहीं मूर्तिकार की महीन छेनी से कटते
और वांछित आकार न मिलने पर आंसू बहाते
कहीं नदी में तैरते और रगड़ खाकर भी
शालिग्राम न बन पाने पर विधना को कोसते

पत्थर ......
कहीं बर्फ़ के तले जमते
और धूप को ढूंढते
कहीं सड़क में बिछते
और राजमार्ग न कहलाने पर विक्षुब्ध होते
कहीं किसी भवन की नींव में खपते
और हवा को तड़पते
कहीं ज्वालामुखी बन फटते
और ग्लेशियर को समेटने की पीड़ा पाते
और बहती नदी को रोकने के लिए होते अभिशप्त
तो खुली सड़कों पर ठोकर खाते
पत्थर ,,,,

पत्थर का मानव से ,,,,
शाश्वत सम्बन्ध है
वही संबंधों को समेटने की पीड़ा ,
वही उपादेयता का प्रश्न
और वही परिचय का संकट
कभी एक गुमनाम हवेली की नींव में लगा
तो कहीं एक मंदिर में गड़ा
पत्थर सा इन्सान,,,
जिसकी जीवंत अभिलाषाएं
मूक होकर नभ को ताकती रहती हैं
अनंत तक ...
मूर्त होने का क्षण
*
रामकिशोर उपाध्याय


Thursday, 1 October 2020

Farmer's Plight

The bread that fills our belly

The spices which trigger the buds naturally 

The juicy fruits we taste 

Does it come before us in haste ?

No ,no ,

It comes when Mother earth becomes pregnant of  the seeds

As a fruit of good manly deeds  

The sky showers the rain and pour the dew 

Comes out the shoots new 

Earth wears  a green spangled  gown and sari and smiles in joy

And it comes only  when farmer tills the earth  with hard plough 

And  toils for hours and days 

During winter ,heavy rain and even in  stinging sun rays 

His clothes are drenched with  saline body drops 

Like spring  running on slops

Then come the sweet crops 

But people treats him with  cannons and bats 

Like ants and rats 

To the capitalist delight 

Forgetting the farmer's plight 

But never try to dismiss his right 

For price fair for his children' future  bright 

He may turn day into night 

As he also knows his might 

=

(C)Ramkishore Upadhyay

Saturday, 19 September 2020

रहस्योद्घाटन ??


कल सुबह जब घूमने पार्क में निकला तो देखा कि एक गाय खड़ी है। वैसे इस पार्क में  मैंने पहले कभी एक कुत्ता या बिल्ली भी नहीं देखी थी । अतः एक गाय का वहाँ होना अचंभा था। गाय से शरीर से जेर (गर्भनाल ) लटकी हुई थी जिससे यह अनुमान लगाना कठिन नहीं था कि उसने एक बछिया या बछड़े को जन्म दिया होगा । अगला चक्कर पूरा करते हुए  जब उसी स्थान के निकट आया तो ध्यान से देखा कि वहाँ उसका बच्चा पड़ा था जिसे वह  चाट रही थी और मुझे देखकर चौकस हो गयी। बच्चा खड़े होने का प्रयास कर रहा था और गाय उसे चाट -चाटकर उठने के लिए भी उत्साहित कर रही थी। माँ का  ममता के साथ सहलाना उनमें शक्ति का संचरण कर रहा था। थोड़ी देर बाद वह खड़ा हो गया। थोड़ी देर गाय अवश्य की बछड़े को लेकर इस इंसानी पार्क से निकलकर अपने मालिक के पास चली गयी होगी।उसका मालिक जरूर कोई दूध का लालची और लापरवाह इंसान रहा होगा,वरना अपनी इस दुधारू गाय को ऐसे क्रिटिकल समय में यूँ ही नहीं छोड़ देता।बचपन में गांव में गाय पाली हैं इसलिए दुख भी हुआ यह देखकर। यह  बात तो बड़ी मामूली सी है  और ममत्व के ऐसे उदाहरण भी हर मादा में रोज देखते ही हैं। यह हमारे जीवन का हिस्सा है।फिर भी न जाने क्यों मुझे यह दृश्य प्रभावित कर गया । घर आकर पत्नी को जब यह किस्सा सुनाया उस समय वह मेरे लिए चाय बना रही थी । उसने मुझे पूछा कि आपको पता नहीं इस विषय में। मेरे इस विषय में जानकारी से  इनकार करने पर एक लघु लोक कथा सुना दी । 


बहुत पहले (हो सकता है सतयुग )की बात है कि एक गांव में एक गाय ने एक बच्चे को जन्म दिया। बच्चा जमीन पर पड़ा था। प्रसूति के बाद गाय अपने आप को अशक्त अनुभव कर रही थी। तभी उसने एक महिला को पास से गुजरते हुए देखा तो आवाज दी । "बहन , जरा मेरे बच्चे को उठाकर खड़ा कर दे । " महिला ने इनकार करते हुए कहा कि तेरा बच्चा गंदा है। मेरे कपड़े और हाथ खराब हो जाएगी।"

गाय ने कहा ," ठीक है। मैं तो अपने बच्चे को चाट- चाटकर खड़ा  कर लुंगी। और तुझे यह शाप देती हूं कि तेरा बच्चा तीन साल से पहले ठीक से चलने -फिरने लायक नहीं होगा।" पत्नी ने बात को तार्किकता से आगे बढ़ाते हुए कहा कि  हमारे  बच्चे साल भर तक तो सामान्यतया खड़ा होने में लेते हैं और ठीक- ठाक से चलने में आगे और  दो साल ले ही लेते हैं।यह गाय का शाप हर स्त्री को लग गया ।बात में दम लगा कि  गाय को  जब अपने बछड़े को चाट- चाट कर खड़ा करते देखा ।  लगता है कि गाय युगों से अपनी संतान को इसी तरह सहारा दे रही है और स्त्री जाति को अभी भी अपनी संतानों की  ठीक से आरंभिक परवरिश करने में तीन साल तक कष्ट उठाने ही पड़ रहें है। मैं अपनी वैज्ञानिक दृष्टि से समझता हूँ कि  यह  बालविकास की स्वाभाविक जीव वैज्ञानिक प्रक्रिया है । किन्तु इसे गाय का मानव जाति के प्रति शाप या अभिशाप नहीं है,यह भी मैं नहीं  कह सकूंगा,क्योंकि  मित्रो,पत्नी, जो स्वयं  माँ भी है, की बात को काटना कितना मुश्किल होता है,यह आप सब जानते हैं।हम लोग मिथकों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक इसी तरह पहुंचाते रहते हैं और अपनी मिथकीय समझ को देशकाल और परिस्थितियों के अनुरूप  विकसित करते रहते हैं । हाँ, यह एक निर्विवाद सर्वकालिक सत्य है कि माँ की ममता में अभूतपूर्व जीवनदायनी शक्ति होती है जो बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान करती है।

*

रामकिशोर उपाध्याय 

Saturday, 13 June 2020

चौधरी चरण सिंह को 33 वीं पुण्यतिथि पर याद करते हुये

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भारत के पूर्व प्रधान मंत्री चौधरी चरण सिंह को किसान नेता के रूप में लोग जानते है | कृषि अर्थशास्त्र के वे अच्छे ज्ञाता तो थे ही | मैं उनका दो विशेष कारणों से स्मरण करता हूँ ...
* चौधरी चरण सिंह भी मेरठ कालेज,मेरठ (जो उनके समय में आगरा विश्वविद्यालय से सम्बद्ध था,बाद में मेरे समय में मेरठ विश्वविद्यालय और अब उनकी स्मृति में चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय कहलाता है ) के छात्र रहें,जहां से मैंने भी बाद में बी.एससी.और एम. ए. की उपाधियाँ प्राप्त की | यह अहसास मुझे एक अलग सी गर्वांनभूति प्रदान करता हैं |
* उनकी रेलवे के प्रति विशेष लगाव के लिये ,मैं उनको याद करता हूँ | भारत के वे पहले प्रधान मंत्री बने जिन्होने रेल कर्मियों को बोनस देने की घोषणा की और रेलवे के लाखों परिवार लाभान्वित हुये | एक रेलकर्मी होने के नाते मैं उनके प्रति श्रद्धा रखता हूँ |
*
रामकिशोर उपाध्याय