Thursday, 7 November 2013

क्यों ?



















क्यों गति अवरुद्ध हैं
इन बहकते कदमों की .....
क्यों जुम्बिश नहीं हैं
इन लरजते होठों पर ......
क्यों कोई जल नहीं रहा हैं
इन दहकती सांसों से ........
क्यों कशिश कम हैं
इन बोलती आँखों में .....
क्यों आनंद-राग का आलाप नहीं हैं  
इस पूरी भाव-भंगिमा में .............
क्यों तार झंकृत नहीं हैं
ह्रदय-वीणा के.........
ये न तो उत्स का क्षण हैं
और अस्त का भी नहीं  
यह एक जीवन काया हैं ,,,,,,,
जो एक पल की माया हैं,,,,,,,,,,,
यह राग है सृष्टि का ,,,,,,
जिसको  
एक शोला भी चाहिए
और एक चिंगारी भी.    


रामकिशोर उपाध्याय 

Tuesday, 5 November 2013


kuch bikhre phool..
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साहिल से मौजें टकराती तो हैं, 
शजरों में हवाएं लहराती तो हैं, 
जुल्म ख़त्म ना हो बेशक*मेरी,
किले से आवाजें टकराती तो हैं. 



कविता लोक में एक लघु प्रयास --एक मुक्तक 
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दर्द जब भी उभरा,
हद तक ही उभरा,
शिकवा क्या*करे, 
वो दिल से*उभरा. 

रामकिशोर उपाध्याय
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खुदा मिला जन्नत के दरवाजे पर,
वो भी मेरी तरह खामोश तन्हा था.


दिवाली के बाद 
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के बाती जल गयी और जल गया सब तेल,
माटी की काया का माटी में मिलने का खेल.

जबतक तम हैं छाया दिवाली का ये सन्देश,
के मिट्टी,बाती और तेल का होता रहेगा मेल. 

रामकिशोर उपाध्याय 
04.11.2013



"शीर्षक अभिव्यक्ति --- 81" (चित्र)- एकल काव्य पाठ –एक साहित्य मंच में प्रस्तुत एक लघु प्रयास 
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“मैं विदेह हूँ” 
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तुमने बड़ी ही
होशियारी से एक बाड़ लगाया
कटीलें नुकीले तारो का............
मेरी आज़ादी को
कैद करने की व्यवस्था का अच्छा ताना-बाना
अरे ! आप भी औरों जैसे निकले......
तुमने भी वही पाश फैंका शकुनी की तरह
पर ये पाश पहले भी पिट चुके हैं
हस्तिनापुर में द्वापर में
शायद भान नहीं हैं
कि इस बाड़ ने द्वार रोका हैं
आशा के झरोखे अभी हैं
मेरा स्थूल बंधन में हो सकता हैं
मेरा सूक्ष्म तो नहीं ............
जो पवन की तरह उन्मुक्त हैं
पावक की तरह उर्ध्व हैं
आकाश की तरह व्यापक हैं
मैं ,,,,
कैद कैसे हो सकता हूँ
यह बात ऊपरवाला भी जानता हैं
तुम्हारे आकलन व्यर्थ
तुम्हारे प्रयास भी व्यर्थ
मैं देह भी हैं ...
व्याकुलता और झंझावातों में
जीने की आशा
और आस्था के साथ
इस बाड़ के पार
मैं विदेह हूँ.............

रामकिशोर उपाध्याय


Saturday, 2 November 2013


















कल दीवाली हैं ...
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दीप ......
बहुत से हैं जले हुए,
कुछ कल जल जायेगे 
युद्ध ......
अंधकार से जारी हैं
और कल भी जारी रहेगा
फिर भी अन्धकार तो मिटा नहीं
तो क्या युद्ध करना छोड़ दे
नहीं ना .......
आज ही खबर आई
एक शहर को दर्पण से आलोकित किया
जो सदियों से अंधकार में था
अर्थात ........
यद्ध करने से विजय प्राप्त होती है....

फिर भी
अपने अंतःकरण
में एक दीप अवश्य
आलोकित करना
अहम् के हनन हेतु
चिंतन मनन हेतु

रामकिशोर उपाध्याय

दो नवम्बर २०१३ 















के दिल में रखा*खाली एक कोना,
उसी में वक़्त बेवक्त हँसना रोना,
नदी जैसी खुशी को वहीँ डुबो देना, 
उसी में समुद्र जैसे दुःख को धोना. 

रामकिशोर उपाध्याय

Friday, 1 November 2013











ये दीप कहाँ रखूं ?
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आज दिवाली हैं
जगमग हैं घर,गली, कुंचा और मेरा गाँव
भर आई हैं दीपों की थाली
हर रंग और रूप से सजे हैं दीप
कुछ मेरी भावना से  
कुछ मेरी कामना से
कुछ मेरी माँ के स्नेह से जले
उन्हें रख लिया मैने आस्था के द्वार पर
कुछ पिता के आशीष से सने
उन्हें रख लिया मैंने विश्वास के द्वार पर
कुछ मेरी संतान के सम्मान से जमे हुए
जिन्हें मैंने रख दिया आत्मविश्वास के द्वार पर
कुछ एक भार्या के प्रेम से भरे-भरे
जिन्हें रख लिया मैंने ह्रदय के द्वार पर
कुछ दीप अभी शेष हैं मेरे संबंधो के
स्वयं के स्वयं से ----
स्वयं के जगत के ----
उनके और अपने----  
जिन्हें मैं घर की देहरी पर रखना चाहता हूँ
फिर आप ही बताओं
कि ये दीप मैं कहाँ रखूं ?.............


रामकिशोर उपाध्याय 

Thursday, 31 October 2013

कुछ अनजाने रिश्ते ...













वो कभी 
मिट्टी में पड़े बीज 
दिखे ही नहीं बरसों तक 
किसी अनजाने रिश्ते की मानिंद  

करते रहे
किसी अनुकूल मौसम की प्रतीक्षा 
पनपे तो
बरगद के पेड़ की तरह
फैले तो
अमरबेल की तरह...

रामकिशोर उपाध्याय 
31.10.2013