Friday, 21 October 2011

'दिवास्वप्न'

'दिवास्वप्न'
पथरा गई थी
उसकी दो आंखे देखते-देखते ----
साकार होने का क्षण
उस दिवास्वप्न को
जो दिया था उसे व्यवस्था ने --
आश्वासनों का अक्षय -पात्र मिला था सभी से 
जब भी वह रेंगता था उसे पाने को
बिना सींग वाले राक्षस उसे त्राण देने लगते थे 
और वह प्रयास करने लगता था मुक्त होने का
उसकी सूखी  हड्डियाँ 
भक्षण करते-करते हो गयी थी
जरा सख्त --
दर्द करने लगते थे  जबड़े उसके
आश्वासनों का व्यंजन चबाते-चबाते
सुपोषण का वह
शिकार बन गया था.
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' अपने-अपने यथार्थ '

'    अपने-अपने यथार्थ  '

बाबा ! सितारे जमीं पर लाऊंगा 
चाँद को खिलौना बनाऊंगा
आयेंगी जब ठण्ड 
सूरज पर हाथ सकेंगे------
बाबा! आस्मां की तख्ती पर
देवदार की लम्बी कलम से 
नदी के नीले जल की सियाही से
जीवन -संघर्ष की गाथा लिखूंगा  ------
बेटा! देखते हो खूंटी पर टंगा वह मैला कुरता
उसकी बाजु पर  लगी वो कई पैबंद
मेरे पायजामे पर पड़ी बेतरतीब सिलवटे
झुर्रियो से ग्लोब बने मेरे चेहरे को
भीतर धंसी ये दो आँखे 
पहचान कर लो अपने यथार्थ की ---------------
मै थोड़े तिनके एकत्र कर लूँ
तुम आग मांग लाओ पड़ोस से
आज हम आलू  भूनेंगे 
जो मैंने चुराए है खुदे खेत से कल ही रात  
और अपने हाथ सकेंगे------------------------

20.10.2011

Wednesday, 19 October 2011

'आकाश को मुस्कराते देखा '

प्रिय मित्रो ,

आपके लिए एक रचना प्रस्तुत हैं. आपकी टिप्पणी अपेक्षित है. 

'आकाश  को मुस्कराते  देखा '

कल
 छत    से  आकाश  को
धरा  के   लिए   मुस्कराते  देखा .

बादलों  से परियों   को
प्रेम   के   लिए   उतरते  देखा .

हवा  से जुगनुओं  को
तैरने  के  लिए   बतयाते  देखा  .

तारों  से  चाँद  को
रौशनी  के  लिए  उलझते  देखा  .

कहीं  -
मैं  न  देखता  ही  रहूँ ,
डराने के लिए  बिजली  को कड़कते  देखा  .

कल
छत  से  आकाश  को
धरा  के  लिए  मुस्कराते  देखा .

फूलों   में  चांदनी  को
छिपने  के  लिए  बिखरते  देखा  .

पेड़ो  में  चाँद  को
छूने  के  लिए   लपकते  देखा .

शाखों  में  खगों  को
जीने   के  लिए  सिमटते  देखा .

पत्तों  में  नमी  को
मिटने  के  लिए  लुढ़कते  देखा .

कहीं   –
मैं  जागता ही   न  रहूँ
भोर  में  किरणों  को रचने   के  लिए  विचरते  देखा.

 कल
 छत    से  आकाश  को
धरा  के   लिए   मुस्कराते  देखा .

२०.१०.२०११

परिचय


प्रिय मित्रों,
इस ब्लॉग के माध्यम से मैं अपनी रचनाओं का परिचय आपको करूँगा और आपके सुझाव व
आलोचनाओ का स्वागत करूँगा ताकि बेहतर रचना दे सकू. प्रस्तुत है पहली कविता इस ब्लॉग पर.
धन्यवाद. 
रामकिशोर उपाध्याय
19.10.2011

'लोग कहें मधुप,  मैं कहूँ फ़कीरी'

हूँ विनम्र , पर झुकता नहीं मस्तक ,
लोग कहे अभिमानी, मैं कहूँ खुद्दारी.

हूँ  राजा , पर लुटता नहीं अविवेक,
लोग कहें कृपण, मैं कहूँ व्यवहारी .

हूँ समर्पित, पर करता नहीं अनुकरण,
लोग कहें एकाकी, मैं कहूँ मजेदारी .

हूँ कठोर ,पर थोपता नहीं अनुशासन, 
लोग कहें मृदुल , मैं कहूँ समझदारी .

हूँ मुक्त, पर भूलता नहीं  अनुपालन,
लोग कहें मधुप,  मैं कहूँ फ़कीरी.

   २४.९.२०११