Monday, 1 July 2013

जाने के बाद



















जब  पत्ता गिरा यादों के लम्बे दरख्त से सूखकर 
 जिस्म पे जख्म न थे पर हर शाख रोई दहाड़कर  

गहरी जड़ें हिलने लगी और कलियां मुरझा गयी
जब वो शाख पे आबाद हिस्सा जाने लगा उड़कर  

वो बाशिंदे वो चीटियाँ  जो बैठा करती थी उसपर 
गुमसुम हो गए यह कहकर अलविदा ऐ रहबर

रात   ओंस की चांदी और वो सुबह सोने की लकीरें 
अब नहीं होंगी रोशन उड़ गयी हवा में यह सोचकर

जाने के बाद फिर नहीं होगा आना  पक्का है उसूल 
वक़्त का एक ही लम्हा रख देता है सबको तोड़कर   

राम किशोर उपाध्याय 
  

2 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा आज मंगलवार (02-07-2013) को "कैसे साथ चलोगे मेरे?" मंगलवारीय चर्चा---1294 में "मयंक का कोना" पर भी है!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. शास्त्री जी , आपका हृद्य से आभार

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