Tuesday, 21 March 2017

आज विश्व कविता दिवस पर। ..........कवि झूठा हो सकता है..



कवि झूठा हो सकता है
मगर उसकी कविता होती है सच का दस्तावेज 
 कविता एक शब्द जाल हो सकती है 
मगर व्यक्त एक-एक शब्द होता है मानीखेज  
हर शब्द कई रंगों में डूबा हो सकता है 
मगर कवि होता है मन को इन्द्रधनुषी रंगों में रंगने वाला रंगरेज 
कवि झूठा हो सकता है
मगर उसकी कविता होती है सच का दस्तावेज ........................... *...........................
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कविता में दर्द हो सकता है
मगर दर्द की कविता में होता है अमरता का तेज
जैसे तुम्हारे लिए मेरा होना
या अक्सर तुम्हारे लिए मेरा रोना
जीवन में ख़ुशी तो महज एक एपिसोड है
मगर दुःख तो इस संसार में होता है ऑलवेज  
कवि झूठा हो सकता है
मगर उसकी कविता होती है सच का दस्तावेज ..............
*
रामकिशोर उपाध्याय 

  


  

Saturday, 4 March 2017

प्रश्न क्या करे नचिकेता ?

क्यों बैठे हो द्वार से सटकर  ?
तीन दिवस से हठकर
क्या तुम्हे यह नहीँ बतलाया
कि नहीँ ठहरते द्वार पर
क्या स्वर्ग नर्क का ठिकाना नहीँ किसी ने  दिखाया
हो कौन तुम ?
मैने तो तुम्हे नहीँ बुलवाया

नही हूँ  किसी ऋषि की संतान
रखता हूँ बस साधारण मानव सी पहचान
नहीँ आया हूँ पाकर अपने पिता का शाप
मुझे तो बस काट गया  था मानवता का साँप
फिर आना पड़ा यहाँ श्रीमान
कहते है यही विधना का था फ़रमान

जब थे नहीँ  तुम नचिकेता
फिर क्यों रहा द्वार पर तीन दिन  बैठा

बोला तो है प्रभु , हूँ एक मानव जात
हाय ! यहाँ भी पडने लगी लात
मेरा भी कुछ अधिकार
हो शक्ति सम्पन्न,हो जाये कुछ मेरा भी उद्धार

सुनो प्रभु !!

नहीँ चाह मुझे पहचाने अगले  जन्म में पिता
उसने ही ने तो मुझे था उस नरक में घसीटा
क्या तुम दे सकते अभय का वरदान ?
जाकर मैं कर  सकूं लेखनी से स्वतंत्र सृजन अवदान
कुछ और मांगो वत्स !

ओके !!

चाह नहीँ मुझको मिले अमरता का ज्ञान
मुझको मानव होने में ही हौ सुख महान
थी धरा पर सुरम्य घाटियाँ
खिलती थी फूलों सी बेटियों की क्यारियाँ
क्या तुम दे सकते हो कि हो सुरक्षित सब नारियां
कुछ और मांगो वत्स !!

राइट सर !ii

चाह नहीँ मुझको जानूं हवन विधि और कहलाऊँ अग्निहोत्र
धन लेकर पाप खरीदूं दूजों के बतलाकर  स्वगोत्र
क्या सिखला सकते हो करे सब कैसे वो अपने-अपने  कार्य
हलवाहे,श्रमिक,शिक्षक हो नेता अभिनेता और अधिकारी से  अधिक स्वीकार्य
कुछ और मांगो वत्स !!

मगर क्यों !!!!

तीन प्रश्न थे नचिकेता के जिनके तुमने दिये थे उत्तर
ऋषिपुत्र के सामने हुये तुम्ही थे निरुत्तर
अब क्या इस युग में तुम इतने कमजोर हो
क्या रहे नहीँ अब सत्य,बस सत्य  का शोर हो 

वत्स,चुनाव सर पर है देवलोक में
यहाँ भी वैसा ही है जैसा भूलोक
कुछ भारतीय नेता अब यहाँ के आवासी है
ले आये यहाँ भी लोकतंत्र
कौन होगा अगला यम ,यहीं उदासी है

जिसको चाहे चुन लेना
मतदाता कॊ कुछ हरे गुलाबी नोट  देना
कुछ कॊ मज़हब धरम की अफीम बाँट देना
किसी कॊ खाट पर बिठाकर समझा देना
या बिजली पानी फ्री कर देना

चुप्प !!!

वत्स ! यहाँ है सच में लोकतंत्र
नहीँ तुम्हारे वाला  लठतंत्र
ज्यादा चू चा नहीँ
ले जाओ विश्रामगृह की चाबी
यहाँ बहुत है काम बाकी
चुनाव नतीजों के बाद 
अगले यम ही आपके प्रश्नों के उत्तर देंगे
अभी आचारसंहिता लागू है

जो आज्ञा प्रभु !!!
*
Ramkishore उपाध्याय

Monday, 27 February 2017

अंतर में निरंतर

*
सड़क की धूल से
मुझे एलर्जी है
कार से धुआँ उडाना
मेरी मर्जी है
तुम्हारे जुल्म पर आवाज़ उठाना
मेरा धर्म है
मगर मेरे विरुद्ध बोलना
सरासर जुर्म है
मैं तो झूठ के
नक्कारखाने की
गूँगी तूती हूँ...निरुत्तर
बजती भी रहती हूँ
मगर
अंतर में निरंतर 
*
रामकिशोर उपाध्याय

Tuesday, 7 February 2017

मधुमक्खी का डंक ----------------------


पानी अब पी रहे एक घाट पर 
क्या शेर क्या बिल्ली 
दुम दबाकर निकल पड़े 
वोट मांगने अब सारे शेखचिल्ली
झुक- झुक कर रहे
बड़े अदब से सबको सलाम -नमस्ते
कुछ मुफ्त में निपट जायेंगे
कुछ पा जायेंगे राजमहल के रस्ते
पांच साल फिर न मिलेंगे
हो गए जो राजा या वो रह गए जो रंक
वोट ओढ़कर सहती रह जाएगी
 जनता मधुमक्खी का डंक
*
रामकिशोर उपाध्याय
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Thursday, 29 December 2016

हज़ार के नोट

आजकल 
लोग रिश्तों को भी 
सिक्कों की तरह जमा करते हैं 
और जब जरुरत होती है
 गुल्लक तोड़ लेते हैं
संवेदनाएं
 विमुद्रीकरण में हज़ार के नोट की तरह
चलन से बाहर हो जाती हैं
और
शेष रह जाता है
भग्न शरीर ..........................................
जो अगले अनुबंध की प्रतीक्षा करता रहता है
*
रामकिशोर उपाध्याय

Tuesday, 27 December 2016

फ़िलहाल ............

फिलहाल....
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रेत के ढूह 
सिकती है रूह 
दिखती नहीं छाँव 
लोहे के पाँव
चले कैसे..
फिलहाल
लाइन में खड़ा है वो
*
रामकिशोर उपाध्याय

मुक्तक एवम अन्य

मुक्तक 
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यहाँ के राम वहाँ पर रहमान हो जाये
उचककर धरा ऊपर आसमान हो जाये
खिल जाये बाग के वो सारे उदास फूल
यदि मेरी उनसे जान पहचान हो जाये

 *
उनके साथ सांसों का सौदा हो गया ।
किसने कहा मैं इंसा बोदा हो गया ॥

*
हे प्रभु !!!

बख्शना गर किसी कॊ जिन्दगी तो देना सभी सामान ।
देना उसे तू सभी राहते और न सिसके कभी अरमान ॥
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सबके जीवन से मिटे,दुखों का अन्धकार
मात्र यही शुभकामना,सुखमय हो संसार 
*
अब कोई ऐसा मिल जाए..........जिसे अपना बताया जाय |
फिर कुछ पल ऐसे मिल जाए जिन्हें मिलकर बिताया जाय | |


*
कागज़ के उस टुकडे ने मेरी शक्ल औ सूरत बदल दी ।
दो हज़ार का नोट नहीँ,वो उसका लेट कबूलनामा था ॥

*
काश !हम तुम्हारी कश्ती पर सवार होते |
तुम ही नाखुदा होते,तुम ही पतवार होते ||
*

कल की धुंधली परछाई आज के उजालों पर न हो ।
उत्तरों की जुस्तजू में वक़्त जाया सवालों पर न हो ॥
*
यह धरा रहे धनधान्य पूर्ण,सबके तन पर परिधान रहे।
सदा रहे जयघोष कर्म का,ऐसा मेरा हिंदुस्तान रहे ॥

*
गमले में उगा बोंजाई बड़ा बरगद हो नही सकता 
मगर उसको बढ़ने से भी कोई रोक नही सकता 


*
रामकिशोर उपाध्याय

*
Ramkishore Upadhyay