Wednesday, 12 December 2018

ठंडा होता सूरज


हर तरफ शोर है 
धुंध में लिपटी भोर है 
खाकर जमीन की कसमें 
पेड़ों को हवाएं लील रही है 
समंदर में उबल रही हैं 
मछलियों की बस्ती
बादलों से बरस रही है
तेजाब की सूखी नदी
ध्रुव पर पेंग्विनों की
लाशों के अंबार हैं
कहने को सावन की फुंहार है
धवल चान्दनी अब जल रही है
पर सत्ता की घुड़दौड़ में
पश्चाताप नहीं,वार्तालाप नहीं
केवल प्रलाप है गहरे
या चल रहे हैं मौहरे
आमजन के वक्षस्थल पर रुपहले
कुछ तुरप के पत्ते ...नहले पर दहले
और न्याय का सूरज .....
ठंडा हो रहा है उदय होने से पहले
*
रामकिशोर उपाध्याय

कबतक चलेगा अंधेरों का राज


कहती रहती मत सोना और उठ जा तू
ओस में भी पेड़ की कोटर को बना लेती अपनी रजाई
फिर सूरज की किरणों से करती अपने गमगीन गीले पंखों की सफाई
बच्चों की खातिर खेतों में लगती दाना चुगने
आँख मीचकर करने लगती सपने बुनने
देख -देखकर शोर करते बच्चे
सारे जग के लगते अच्छे
नहीं किसी से भेद वह करती
मुंडेर पर बैठकर शाम को वह रहती हँसती
दूर गगन में उडती रहती पर नहीं भूलती घोसला अपना
नहीं तोड़ती किसी के घर का सपना
मगर उसकी ख़ुशी न बाज को भाती
बच्चों को पीछे से वह बतलाता उनकी जाति
कहता तुम कोयल हो,तुम हो कागा
फिर कैसे बंधा तुम्हारे मध्य ये प्रीत का धागा
बच्चे अब हो रहे थे बड़े
अपने पैरों पर होने लगे थे खड़े
अब नहीं खाते वे माँ का लाया तिनका दाना
अब उड़ाने लगे है बाज का फैंका मांसाहारी स्वादिष्ट खाना
माँ देख रही थी जलता घर सुहाना
उसको डस रहा था डर अनजाना
सोने का घोसला बनाने को उकसा रहा था बनकर गिद्ध
कर रहा था अपनी सत्ता का मकसद सिद्द
पेड़ों पर सोने के पिंजरे लटक गये धीरे -धीरे
पाँव में बंध गई लोहे की जंजीरे
मुंह पर ताले और धूप को निगल गए अँधेरे
अब कलरव नहीं होता, गाते सिर्फ भक्ति गीत वे सुबह- सवेरे
मन में सन्नाटा,तन पर हावी धन कुबेर
मुनिया आती नही अब मुंडेर
देख उसे एकदिन उपवन का एक माली बोला
कैसे हो आजाद ..... यह रहस्य खोला
फिर रोना भूल गई वह मेरे बन की चिड़िया
एकदिन जरुर होगी फिर से .........उसके खुले पंखों पर दुनिया
बढ़ता है जब -जब वंचितों के संतापों का ताप
सिंहासन पर भारी पड़ने लगते हैं जन-मन -गण के अभिशाप
प्राची से सूर्य उगेगा,आखिर कबतक चलेगा अंधेरों का राज
जनता ही ले लेती है एकदिन हर नरपति के सिर से ताज
*
रामकिशोर उपाध्याय

कोई रक्कासा नहीं हैं यहाँ



आज भी कल जैसी ही है एक रात 
रोज की तरह फिर वहीं बात 
वही तकिया ...
वही दो सर ..धड़कते जिस्म
आँखों में सुरमें की सलाई नहीं ......
काजल की .उँगलियाँ घूमती है
माथे चौड़ी बिंदी ..
होंठ पर अंग्रेजी ,,ना बाबा ना ..हिंदी
फूल तो हैं मगर नहीं है खुशबू
लथपथ जिस्म से निकले पसीने की बदबू
लाओ डियो स्प्रे कर दूं ,उसने कहा
वरना सुबह कमीज से कई प्रश्न होंगे
भूले हुए मौजें हर जवाब दे देंगे ,मौजें मत भूलना
अब जाओ सुबह बिस्तर की सिलवटें ठीक कर दूंगी
अपनी पेंट ठीक से पहन लेना
एक पेग और लगाओगे ........
सिगरेट का एक कश.... धुआं धुआं ...
उड़ गई सब हया
तुम कल न आ सको तो बतला देना
मैं साहिल को बुला लूंगी
हां ,मेरा भी आना है मुश्किल
रेखा भी ,,अकेली है कल ..
जानेमन ! यह शहर का इश्क है
जिसमें है...
न जुनून
न सुकून .......
सिर्फ जिस्मों का रक्स है ...मगर नहीं है कोई रक्कासा
न वो ,,न रेखा और न ही कोई शालिनी या बिपासा
*
रामकिशोर उपाध्याय

Sunday, 9 December 2018

अलभ्य और अखण्ड .. ==============

हर शब्द ...
जब हो जाता है निस्शब्द 
तो ढल जाता है एक -एक करके सांचे में
बस वक्त के अदृश्य ढांचे में
और लेखनी को कर देता है बेजार
और रचनाकार हो उठता है बेक़रार
कभी उन्हीं शब्दों को कहता उदासी
बनकर जैसे हो कोई सन्यासी
ढूंढता अर्थ विरक्ति में
धर्म अथवा दर्शनविहीन भक्ति में
अवतरित शब्द ...
कभी जब नुपुर बनकर कहीं बजते
तो गीतों में प्रेम -संदेशों में जाकर सिमटते
भावविभोर हो पायल में जाकर टूट जाते
और वर्षा की बूंदों को तरसते चातक में मुंह में जाकर फूट जाते
खुले सीप में मोती बनकर प्रणय की अंगूठी में जड़ते
कभी विरह चट्टानों जैसे जड़ होकर राह में तड़पते
यही शब्द ...
शबनम में जाकर चुपचाप सो जाता
और परिंदों की चोंच में जाकर उजाले के बीज बोता
भोर की पहली किरण के रथ पर होता सवार
ले जाता रवि को पर्वत से उस पार
सायं को नायिका के प्रणय निवेदन के सुरों में खनकता
काजल सा आँखों में घुलता
मधुमास और मधुशाला में मध्य टहलता
प्यार और प्यास में बीच गमकता
वही शब्द ......
हर बार एक नया अर्थ खोजते
हर तर्क से नये विमर्श गढ़ते
विवश होते फूट पड़ने को
और नई कोंपलों जैसे नहा धोकर निखरते
मगर हर बार कविता बनकर
पुष्पित होते
फलित होते
और कवि के कंठ में मुस्काते
जैसे
भगवान शिव के गले में पड़े हो
माता पार्वती के हर जन्म के पड़े मुंड
प्रेम के प्रतीक स्वरुप अलभ्य और अखण्ड ..
**
रामकिशोर उपाध्याय
यह रचना आज सुबह से ही व्यग्र ही उतरने के लिए ...यह अमर कथा से प्रेरित है जो शिव भगवन ने माता पार्वती को सुनाई थी ..
21.4.2015

Wednesday, 5 December 2018

दिल में दीवारें लकड़ी की

सड़क पर पहुँचने के लिये 
पगडंडी छोड़नी पड़ी
पेड़ ,नदी, नाले और 
खेतों में फूलती सरसों छोड़नी पड़ी 
तितलियों के रंग और 
भौरों की गुंजन छोड़नी पड़ी
मधुमक्खी का शहद और
अमराई छोड़नी पड़ी
हवा में ठंड की खनक और
धूप की चमक छोड़नी पड़ी
और ,,,,,
धुंध में लिपटी सुबह और
शाम को सिसकती हिरनी मिली
पत्ते और पेड़ कटे छटे
और शाख पर घूमती चीटियाँ मिली
पानी का टैप और
दूध की मशीन मिली
कंक्रीट के घोंसले
और दिल की दीवारें लकड़ी की मिली
खुरदरी हथेली से
अब कैसे उनके कपोल सहलाऊँ
सोचता हूँ फिर से आदिम बन जाऊँ
*
रामकिशोर उपाध्याय

ये प्रश्न मुझसे से भी है ,, तुमसे भी है

तुलसी की पत्तियां डालकर 
अदरख के साथ उबालकर 
जब -जब पीता हूँ चाय ,,,,,,,,,,,,
ठण्ड ही नहीं मेरा डर भी हो जाता है काफूर .........
शब्द -तुलसी जब उबलती है
मजहब के अदरख के साथ
बड़ी सी केतली में
पीता तो तब भी हूँ यह चाय ...........
पर सिहर जाती है मेरी हड्डियाँ
डर खुद थरथराने लगता है बनकर लातूर
क्या जग छोडकर निकल जाऊं
और रणछोड़ कहलाऊं
बोलो ! कब आओगे कृष्णा
कब हरोगे शिव जग की तृष्णा
पुनर्पाठ करो अब फिर से शास्त्रों का
और पाठ करो जरा शोर से
जग जाए शेषशैय्या से हरि विष्णु
देखते हैं कबतलक .....
कब कहलायेंगे हम मानव ,कब होंगे सहिष्णु
पर क्या अनंत प्रतीक्षा करना उचित है
है कोई सोचने वाला
है कोई दीपक जलाने वाला
इस अँधेरी रात में ..............
ये प्रश्न मुझसे से भी है ,,
तुमसे भी है
*
रामकिशोर उपाध्याय