Wednesday, 5 December 2018

दिल में दीवारें लकड़ी की

सड़क पर पहुँचने के लिये 
पगडंडी छोड़नी पड़ी
पेड़ ,नदी, नाले और 
खेतों में फूलती सरसों छोड़नी पड़ी 
तितलियों के रंग और 
भौरों की गुंजन छोड़नी पड़ी
मधुमक्खी का शहद और
अमराई छोड़नी पड़ी
हवा में ठंड की खनक और
धूप की चमक छोड़नी पड़ी
और ,,,,,
धुंध में लिपटी सुबह और
शाम को सिसकती हिरनी मिली
पत्ते और पेड़ कटे छटे
और शाख पर घूमती चीटियाँ मिली
पानी का टैप और
दूध की मशीन मिली
कंक्रीट के घोंसले
और दिल की दीवारें लकड़ी की मिली
खुरदरी हथेली से
अब कैसे उनके कपोल सहलाऊँ
सोचता हूँ फिर से आदिम बन जाऊँ
*
रामकिशोर उपाध्याय

3 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (07-12-2018) को "भवसागर भयभीत हो गया" (चर्चा अंक-3178) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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