Monday, 1 April 2013

जीना है तो मेरे साथ चलना सीखो!


उसने
मेरा हाथ पकड़ ही लिया ....सडक से गुज़रते हुए ---
वह सडक भी नहीं
थी एक पतली सी पगडण्डी -
जिसे स्वयं एक -एक कदम से गढ़ा था
मै बड़ी ख़ामोशी से
सर झुकाए होले -होले
बढ़ रहा था अपनी मंजिल की तरफ
वह मेरी धीमी आहट  से चोंका
लोग सरपट घोड़े की माफिक दौड़ रहे थे
हंटर लहराते चले जा रहे थे
कई लोग उनके घोड़ों की लाते भी खा रहे थे
उसने उनकी ओर  दृष्टि भी नहीं डाली
मैंने अपना अपराध जानने की जिज्ञासा व्यक्त की
उसने बड़े जोर से आंखे तरेरी
एक खडूस बॉस की तरह
मानो प्रश्न ने उसकी अधिकारिता को तारतार कर दिया हो
मै अवाक् था,विवश था
बिन अपराध के मेरी गति को बंद होने पर  
मैंने  आक्रोश व्यक्त किया
उसने करवट बदली ---
जानते नहीं मै कौन हूँ ?
मै समय हूँ !
मै आज का समय -
और मुझे तुम्हारे जैसे लोग--
कतई पसंद नहीं है -
जीना है तो मेरे साथ चलना सीखो!

राम किशोर उपाध्याय
1-4-2013


2 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    --
    इंजीनियर प्रदीप कुमार साहनी अभी कुछ दिनों के लिए व्यस्त है। इसलिए आज मेरी पसंद के लिंकों में आपका लिंक भी चर्चा मंच पर सम्मिलित किया जा रहा है और आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल बुधवार (03-04-2013) के “शून्य में संसार है” (चर्चा मंच-1203) पर भी होगी!
    सूचनार्थ...सादर..!

    ReplyDelete