Thursday, 11 April 2013

गुनाह का अक्स

उठा है फिर से आज दर्द का तूफान सोये हुए घावों से   
आयी  है फिर से आज घुंघरू की सदां खोये हुए पावों  से

चांदनी में झुलसते ही रहे वो मेरे मासूम से जज्बात
मिला है फिर से आज मोहब्बत का पैगाम खुश्क लबों से     

यहाँ डगमगाती  रही कश्ती बेख़ौफ़ उस समंदर में 
आया है फिर से आज साहिल का वादा उन नाखुदाओं से 

मिरा  दिल डूबने लगा और रूह पनाह मांगने लगी 
उभरा है फिर से आज  गुनाह  का अक्स उन निगाहों से  

राम किशोर उपाध्याय
11.04.2013

Tuesday, 9 April 2013


राह के रोड़े
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यूँ राह चलते ---
किनारे पड़े कंकडो को पैर मत मारों
बेशक वे तुम्हारी राह का रोड़ा हो
अगर लौटते समय ----
उसी राह पे पास से गुज़रती
नदी का बेलगाम पानी चढ़ आया
तो वही कंकड़
तुम्हे घर की राह दिखायेंगे !!!!!

राम किशोर उपाध्याय
९.४.२०१३

Wednesday, 3 April 2013

मेरे खुशनुमा चहरा देख लोग समझते है कि भरा पड़ा होगा माल असबाब ,
देखो, है पास एक दिल, कुछ कागज़ के टुकड़े ,पेंसिले और शब्द बेहिसाब। 

राम किशोर उपाध्याय
4-4-2013
मै ढूंढता रहा उन्हें उन राहों  में हो बदहवास,
जो अक्सर आती थी घूमती हुई मेरे ही पास।

राम किशोर उपाध्याय

Tuesday, 2 April 2013

तो आंसू भी कभी खारा ना होता !!!!


आँखों में ये सागर गहरा ना  होता,

तो आंसू भी कभी खारा  ना होता.

बहुत ख्याब देखे तेरे कांधे पे सर रखके 
सजायी डगर तारे आसमान से तोड़के 
तेरी बेवफाई से  डूब ही जाती कश्ती  
गर एक तिनके का सहारा   ना होता (१)


आँखों में ये सागर गहरा ना  होता,
तो आंसू भी कभी खारा  ना होता.

बहुत देर तक हम साथ चले 

नंगे पांव जब तक साँझ ढले
खौफ निगाहे तो  मार ही डालती 
गर उम्मीदों ने हमें पुकारा ना होता (२)

आँखों में ये सागर गहरा ना  होता,
तो आंसू भी कभी खारा  ना होता.



कुछ गीत गुनगुनाये,कुछ शिकवे किये,
हर गुनाह को सर आँखों पे रख लिए ,
लील ही जाता  मुझको ये भंवर सुहाना,
गर जिंदगी का बुलंद सितारा ना होता(३)

आँखों में ये सागर गहरा ना  होता,
तो आंसू भी कभी खारा  ना होता.

Monday, 1 April 2013

हर छोटी ख़ुशी को लगाओ गले !




हर छोटी ख़ुशी को लगाओ गले !

मुट्ठी में  रेत की तरह वक़्त फिसल जायेगा,
नहीं कल था और होगा,गर आज संभाला न जायेगा,

सूरज की रोशनी को लपकने को बेताब है चाँद,
आज दिया न जलाया तो एक तारा भी ना टिमटिमायेगा,

नींद में खो जाएगी जवानी और वो हसीं पल भी,
गर ना संजोया इन्हें पलकों में तो ख्याल में भी ना आयेगा ,

हर अमल पर कायम है तेरा मुस्तकबिल ,
गुमराह हो गए  तो वो अज़ीम मुकाम ख्याब में भी ना आवेगा,

हर ख़ुशी मुनस्सर है तेरे जूनून की बुलंदी पे,
वक़्त की पाबंदी हो तो कामयाबी का लम्हा कभी ना जायेगा,

पूरी हो हर तमन्ना, ये हर किसी को मयस्सर कहाँ,
हर छोटी ख़ुशी को लगाओ गले तो रंज पास से भी ना गुजरेगा .

राम किशोर उपाध्याय
02.04.2013

जीना है तो मेरे साथ चलना सीखो!


उसने
मेरा हाथ पकड़ ही लिया ....सडक से गुज़रते हुए ---
वह सडक भी नहीं
थी एक पतली सी पगडण्डी -
जिसे स्वयं एक -एक कदम से गढ़ा था
मै बड़ी ख़ामोशी से
सर झुकाए होले -होले
बढ़ रहा था अपनी मंजिल की तरफ
वह मेरी धीमी आहट  से चोंका
लोग सरपट घोड़े की माफिक दौड़ रहे थे
हंटर लहराते चले जा रहे थे
कई लोग उनके घोड़ों की लाते भी खा रहे थे
उसने उनकी ओर  दृष्टि भी नहीं डाली
मैंने अपना अपराध जानने की जिज्ञासा व्यक्त की
उसने बड़े जोर से आंखे तरेरी
एक खडूस बॉस की तरह
मानो प्रश्न ने उसकी अधिकारिता को तारतार कर दिया हो
मै अवाक् था,विवश था
बिन अपराध के मेरी गति को बंद होने पर  
मैंने  आक्रोश व्यक्त किया
उसने करवट बदली ---
जानते नहीं मै कौन हूँ ?
मै समय हूँ !
मै आज का समय -
और मुझे तुम्हारे जैसे लोग--
कतई पसंद नहीं है -
जीना है तो मेरे साथ चलना सीखो!

राम किशोर उपाध्याय
1-4-2013