Thursday, 25 April 2013

वजूद मिट रहा है
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लहरों पे चाँद हिल रहा  है 
शायद कोई बुला रहा है
    
इन आँखों में एक ख्वाब  हैं 
जो बिन पंखो के उड रहा है

तपन सूरज की अब कहाँ  है
आसमा चादर तान रहा है

आज तो वस्ल की रात है
तारा भी न कोई सो रहा है

खामोशी शोर कर रही है
मानो वजूद मिट रहा है

Wednesday, 24 April 2013


काज़ल किसी कोने में बचाके रखना
कभी आंसू छिपाने के काम आयेगा

रामकिशोर उपाध्याय
24-4-2013



तन्हा रातों  की ईंटों में लगा हैं जुस्तजू   का गारा
पलकों के  बिछे पावड़े  ,है  बाजुओं का  बिछोना


जब मंजिल मिल ही गयी,फिर अब और कहाँ जाना
ठहर जा वक़्त!  बड़ी  मुश्किल से बना यह  ठिकाना

राम किशोर उपाध्याय
24-4-2013

Tuesday, 23 April 2013

!!!! लुट गया हैं चमन मेरा ये खुशबू बांटते- बांटते !!!!


डूब गया है दिल मेरा तेरा अक्स देखते -देखते
लुट गया हैं चमन मेरा ये खुशबू बांटते- बांटते 

आने से तुम्हारे मानो  मंजिल आ गयी थी पास में
कैसे भूलूँ वो  हसीन लम्हे जो गुजरे तेरे आगोश में
                                                     काटी है सदियाँ  कई  रातों में  जागते -जागते
                                                     लुट गया हैं चमन मेरा ये खुशबू बांटते- बांटते (1 )

कहते थे दिल मेरा ,तुम्हारी ही  अमानत
हमारे लिए ले लेंगे ज़माने से भी अदावत 
                                                     रूठ  गयी तू मुझसे क्यूँ  इतना चाहते -चाहते
                                                     लुट गया हैं चमन मेरा ये खुशबू बांटते- बांटते (2 )
फिर आज बादल घिरे, फिर छाई  तन्हाई
दिल में छिपाकर जी रहा हूँ तेरी  बेवफाई
                                                      कहाँ खो गए वो दिन और वो  प्यारी -प्यारी राते
                                                       लुट गया हैं चमन मेरा ये खुशबू बांटते- बांटते  (3)

हो जायेंगे रुखसत हम जहाँ से बस तेरा नाम लेकर
उतर जाता है ज्यूं मांझी भंवर में अपनी नांव खेंकर 
                                                        मिलेंगे अब बहिश्त में बस  तेरा दर  ढूंढते -ढूंढते 
                                                        लुट गया हैं चमन मेरा ये खुशबू बांटते- बांटते   (4 )  


डूब गया है दिल मेरा तेरा अक्स देखते -देखते
लुट गया हैं चमन मेरा ये खुशबू बांटते- बांटते 


( यह गीत लिखने का प्रयास है, अच्छा लगे तो प्रशंसा और ठीक न लगे तो सुझाव की अपेक्षा रहेगी)

राम किशोर उपाध्याय 
23-4-2013

Monday, 15 April 2013


कोई खरीदार ही  मिल जाये !!!!
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बादलों से ही चाँद  निकले  ये  जरुरी तो  नहीं
आरजू  से ही खुदा मिले  ये जरुरी तो  नहीं

बेशक हम घर से बड़े ही मायूस से निकले हो
आगे बढ़कर थाम ले कोई हाथ ये  जरुरी तो नहीं

अक्सर मिलते  है जख्म पे जख्म बेवफाओं से
अपनों से भी मरहम मिल जाये ये जरुरी तो नहीं

अपनों की नफरत का रखता है हर कोई हिसाब
अजनबी से प्यार मिल जाये ये जरुरी तो नहीं

दिल बेचने को फिरता हूँ सरे बाज़ार आजकल
कोई खरीदार ही  मिल जाये  ये जरुरी तो नहीं  

समंदर में खाती है हिचकोले लहरों पे कई कश्तियां
हर एक को साहिल मिल ही जाये ये जरुरी तो नहीं

राम किशोर उपाध्याय
१५.4.२०१३

Thursday, 11 April 2013

 हैं बेताब हर इन्सान अपने निशां  छोड़ने को यहाँ
 मै मिटाता रहा निशां कदमो के जो छूटे यहाँ वहां

राम किशोर उपाध्याय
11/04/2013

दिए को ना बुझाया करो  गुमराहो को जरुरत होगी
दिल को ना जलाया करो हमराहों को जरुरत होगी

राम किशोर उपाध्याय
11*04*2013