Wednesday, 13 May 2015

ग़ज़ल

एक ग़ज़ल
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२ १ २ , १ २ २ , २ २ १ , २ २
प्यार का नया मौसम फ़र्द क्यों है,
मिल गया सहारा,फिर दर्द क्यों है|
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आ गयी नई खुशबू जब चमन में,
बागबाँ हुआ फिर वो जर्द क्यों है |
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छट गयी फलक से जब धुंध सारी,
इन आइनों पर फिर गर्द क्यों है |
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हुस्न खुद हुआ जब बेजार दिल से,
इश्क का ठिकाना फिर खुर्द क्यों है |
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जल रहे मकानों में दीप जगमग ,
रात फिर उजालों की सर्द क्यों है|
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थाम क्यों नहीं लेते हाथ बढ़कर,
प्रेम की छुहन में फिर बर्द क्यों है |
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{ फ़र्द =एकाकी,ख़ुर्द =छुद्र/छोटा, बर्द= ठंड )
रामकिशोर उपाध्याय

2 comments:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (15.05.2015) को "दिल खोलकर हँसिए"(चर्चा अंक-1976) पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

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