Thursday, 29 June 2017

क्योंकि मैं साक्षी हूँ -------------------


जब आप दिखा रहे थे स्वरुप विराट 
कुछ समय के लिए मैं ढूंढ रहा था ठाट 
जब आप मुख में दिखे लिए ब्रह्माण्ड 
हे कृष्ण ! उस समय मन हो रहा था खंड-खंड
क्यों सखे ?
आप उस दिन आज दिखा रहे थे ,,
मैं आज (जो आपका कल था ) को देख रहा था
सच ,जो देख रहा था कह नही सकता
अब तो प्रभु आप भी उसे गीता में नहीं उद्धृत कर सकते
तुमने कहा था हम सब धर्म के लिए मरे और जिए
मगर यहाँ आदमी अधर्म के लिए मर और जी रहा है
क्या यहीं आधुनिक अर्थ है 'वासंसी जीर्णानि यथा विहाय'का ?
क्या इस मशीन मानव का यही युगधर्म है ?
मैं उस दिन कम ,परन्तु हूँ आज अधिक किंकर्तव्यविमूढ़
आज भी युद्ध के लिए होना चाहता हूँ आरूढ़
मगर आज मेरे रथ के पहिये धंस गये हैं
कर्म में नही कीचड में फंस गये हैं
अब और युद्ध नही ...
समय के दुर्योधन को संधि -पत्र लिख रहा हूँ
मगर यह मेरी नहीं है कायरता
हां ,पापी अवश्य हूँ क्योंकि मैं साक्षी हूँ ..........
हे अर्जुन ! उदास मत हो..... यह नहीं है कर्मयुग
यहाँ मानव की शब्दावली में प्रमुख है ''राज'' ...
मगर कौन सा ?
*
रामकिशोर उपाध्याय

2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा आज शनिवार (01-07-2017) को
    "विशेष चर्चा "चिट्टाकारी दिवस बनाम ब्लॉगिंग-डे"
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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