Thursday, 19 November 2015

नवगीत (जैसा )











कुछ पल के मुसाफिर हो
यादों की लकीरें  न खीचों
*
कुछ पल के मुसाफिर हो
यादों की लकीरें न खीचों
ये तिनकों के घरोंदे हैं
वादों की दीवारें न खींचों
कुछ पल के मुसाफिर हो
यादों की लकीरें न खीचों -1
*
बिखरी हैं लटें गालों पर
ऑंखें भी हैं कुछ गहरी गहरी
राग मचलता होठों पर
मन वीणा के तार न खीचों
कुछ पल के मुसाफिर हो,
यादों की लकीरे न खीचों -2
*
ऑखें चमकती शोखी से
पर नैतिकता बनी है प्रहरी
स्पर्श को आकुल मन
कल आज की रार न खींचों
कुछ पल के मुसाफिर हो ,
यादों की लकीरें न खीचों – 3

*
शुभ्र भाल पर पूर्ण चन्द्र
तारे बिखरे मुखमंडल पर
दरक रही हैं नींव किले की
लाज-हया की बाड़ न खीचों
कुछ पल के मुसाफिर हो,
यादों की लकीरें  न खीचों – 4
*
सूर्य दमकता मोहक बन
कानों में लटकते कुंडल पर
पिघल रही है बर्फ शिखर पर
सागर पर लकीरें  न खींचों
कुछ पल के मुसाफिर हो,

यादों की लकीरे न खीचों – 5
यादों की लकीरे न खीचों
*
कुछ पल के मुसाफिर हो
यादों की लकीरें न खीचों
ये तिनकों के घरोंदे हैं
वादों की दीवारों न खींचों
कुछ पल के मुसाफिर हो
यादों की लकीरे न खीचों -1
*
बिखरी हैं लटें गालों पर
ऑंखें भी हैं कुछ गहरी गहरी
राग मचलता होठों पर
मन वीणा के तार न खीचों
कुछ पल के मुसाफिर हो,
यादों की लकीरें  न खीचों -2
*
ऑखें चमकती शोखी से
पर नैतिकता बनी है प्रहरी
स्पर्श को आकुल मन
कल आज की रार न खींचों
कुछ पल के मुसाफिर हो ,
यादों की लकीरे न खीचों – 3

*
शुभ्र भाल पर पूर्ण चन्द्र
तारे बिखरे मुखमंडल पर
दरक रही हैं नींव किले की
लाज-हया की बाड़ न खीचों
कुछ पल के मुसाफिर हो,
यादों की लकीरें न खीचों – 4
*
सूर्य दमकता मोहक बन
कानों में लटकते कुंडल पर
पिघल रही है बर्फ शिखर पर
सागर पर किनारे न खींचों
कुछ पल के मुसाफिर हो,
यादों की लकीरें न खीचों – 5
*
रामकिशोर  उपाध्याय 

4 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (21-11-2015) को "हर शख़्स उमीदों का धुवां देख रहा है" (चर्चा-अंक 2167) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. इस सम्मान के लिए हार्दिक आभार आदरणीय

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  2. बहुत ही सुन्दर रचना

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