Saturday, 2 December 2017

अजीब शर्त

न वादे, न कसमें 
न वफ़ा, न जफ़ा 
न हम उन्हें बाँध पाए 
न वो आज़ाद रह पाए 
मिले तो मुकद्दर 
न मिले तो खली नहीं तन्हाई
मोहब्बत ने यह ताउम्र
कैसी अज़ीब शर्त निभाई
*
रामकिशोर उपाध्याय

Sunday, 26 November 2017

यह तुम भी जानते हो ----------------------



यह तुम भी जानते हो 
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तुम्हारी दुआओं में कब
शामिल हुआ मेरा हिस्सा 
फकत तुम्हारी कालीन 
बनकर रह गया मेरा किस्सा 
जिसके नीचे खिसकाते रहे 
तुम मुझको हमेशा 
ये मेरा हौसला ही था 
जो वक्त की नमी पा 
बन गया बिरवा वट का 
*
रामकिशोर उपाध्याय

Thursday, 29 June 2017

क्योंकि मैं साक्षी हूँ -------------------



जब आप दिखा रहे थे स्वरुप विराट 
कुछ समय के लिए मैं ढूंढ रहा था ठाट 
जब आप मुख में लिए थे ब्रह्माण्ड
हे कृष्ण ! उस समय मन हो रहा था खंड-खंड
क्यों सखे ?
आप उस दिन आज दिखा रहे थे ,,
मैं आज (जो आपका कल था ) को देख रहा था
सच ,जो देख रहा था कह नही सकता
अब तो प्रभु आप भी उसे गीता में नहीं उद्धृत कर सकते
तुमने कहा था हम सब धर्म के लिए मरे और जिए
मगर यहाँ आदमी अधर्म के लिए मर और जी रहा है
क्या यहीं आधुनिक अर्थ है तुम्हारे कहे 700 श्लोकों का 
क्या इस मानव का यही युगधर्म है ?
उस दिन कम था परन्तु आज मैं बहुत अधिक हूँ किंकर्तव्यविमूढ़  
आज भी युद्ध के लिए होना चाहता हूँ आरूढ़
मगर आज मेरे रथ के पहिये धंस गये हैं
कर्म में नही कर्मकांड में फंस गये हैं
अब और युद्ध नही ...
समय के दुर्योधन को संधि -पत्र लिख रहा हूँ
इतिहास इसे मेरी निष्क्रियता अवश्य कहेगा
हे अर्जुन !
मैं तुमसे सहमत हूँ उदास मत हो.....
यह न कुरुक्षेत्र है और न धर्मक्षेत्र
यहाँ की गीता में प्रमुख है ''राज योग ''  
इसलिए  तू कुर्सी के लिए गठजोड़ कर  
और शेष मुझपर छोड़ दे ...
मैं सदैव दोषमुक्त रहा हूँ
क्योंकि मैं साक्षी था ...हूँ .......... और रहूँगा

*
रामकिशोर उपाध्याय

Wednesday, 21 June 2017

मध्यान्ह का सूर्य


मध्यान्ह का सूर्य

एक  दिन दोपहर  मिली
बड़ी बुझी -बुझी
अपने ही कन्धों पर झुकी -झुकी
ऐसा क्यों ?

रथ  का पहिया कभी उलटा चला था
उसे उसके  सारथी ने ही छला था
क्या करती ..
धूप के लूटने का डर था
सूरज की आँखों में जीने का रक्तिम समर था
फूलों के पथ में बिछे थे अंगारे
नभ में घोड़ों को मिले नही चाँद, न थे कहीं सितारे

बस दोपहर ने सिर झुकाकर
सांझ का लबादा ओढ़ लिया
और रौशनी को आँखों में भींच लिया
किसी ने पेड़ की ठूंठ के साथ पाँव बाँध दिये
बस इसी तरह दिनमणि मुक्ति के लिये लड़ता रहा ........
*
रामकिशोर उपाध्याय

Thursday, 18 May 2017

कृष्ण और यशोदा सम्वाद


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देख ले माँ ..
मुख में मेरे ब्रह्माण्ड है .....
यह नहीं मिटटी का गोला
इसमें भरे जय (महाभारत) के सभी काण्ड हैं
यहाँ सभी जीवों में वही तेरा गोपाल है
संग में खड़ी गैया नहीं
ये मेरी इन्द्रियां विशाल है
रम रहा हूँ योग मैं ...
कर रहा हूँ भोग मैं ......
यह नही कोई विरोधाभास है
यही तो सत्य का प्रकाश है
मैं  रहता हूँ जगत में
लिप्त भी
निर्लिप्त भी
ये बाल सखा जो है मेरे
ये आत्माएं है जो मुझे है घेरे
देख ले माँ......
हूँ वही तेरा नन्हा सा दिया
आकर पालन विष्णु के आदेश का कर दिया
कभी कालिया को मारूंगा
कभी गोवर्धन को धारूंगा
कभी कंस की करूँगा हत्या
पर युद्ध में भी धर्म का रहूँगा सत्या
बन जाऊँगा अर्जुन का सखा
सदा  हरूँगा जग की व्यथा
मैं अब जान गयी ,वत्स.............
जग का अब होने वाला है उत्स
मेरे देख रहे हैं नेत्र
तू तो सत्य का ही है मित्र
तू ही त्रिनेत्रधारी
तू ही चक्रपाणी
कहूँगी उससे जो है तेरा बाबा नन्द 
कि लाला हमारा,बच्चा नही,है प्रभु का अमित आनंद
बस अब यह लीला मत दिखा
जा खेल और जग को खेल खिला
तू कितनी प्यारी है माँ .....
*
रामकिशोर उपाध्याय

Saturday, 13 May 2017

तब होती है भोर 
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सोई रात का 
पड़ता जब जीवन से साबका 
शबनम को गगरी में लेने 
चल पड़ती हैं किरणें पनघट की ओर
कुनबे की प्यास बुझाने
लखता उसे सूरज बनकर चितचोर
तब होती है भोर ..........
अलसाये सपने
आँखों में लगे चुभने
स्लेट पट्टी बन जाए अम्बर
उडान की चाहत लगे बढ़ने
और लक्ष्य को देख जब मन में नाचे मोर
तब होती है भोर
*
रामकिशोर उपाध्याय
है अभी उम्मीद बाकी
कट रहे हैं शीश
देवता फिर भी दे रहे नित नया आशीष
उनकी तलवार में है धार
मगर हम हैं सर्जन की नौका में सवार
दे भले कोई हमें कितनी भी गाली
पर बच्चा-बच्चा है इस उपवन का माली
हैं शांत सभी विषधर,बढ़ गई सृष्टि में हिकारत
पर इतना भी खराब हो नहीं सकता मेरा भारत ........................
है  अभी उम्मीद बाकी .......... !!!!!!!!!!!
अभी बहुत कुछ हैं नंगे बदन
प्रगति के पथ पर बढ़ रही तपन
होनी जहाँ चाहिए दराती
वहां से आवाज बंदूक की आती
कारखानों की आग उगलती चिमनियाँ
स्वप्न में बढती रहती हैं नित्य चहलकदमियाँ
जीवन से जीवन के संघर्ष में आत्मा की हो रही तिजारत
पर इतना भी खराब हो नहीं सकता मेरा भारत ............
है अभी उम्मीद बाकी .......... !!!!!!!!!!!
अभी है भोर में उजाला
खेत में उग रहा सबका निवाला
हैं संग में तोप और फरसे
चल गये तो अरि जल को भी तरसे
और खुद पर है यकीं,हम कौम हैं जिंदा
धरा को छोडकर यहाँ उड़ता गगन में हर निर्बल परिंदा
बस उसे राम या रहीम से बुलाना
मगर उसे उसका धर्म और मजहब में भेद न सिखलाना
देखना हम एक दिन कुरु के क्षेत्र में फिर रचेंगे महाभारत
नहीं फिरकहूँगा कि ख़राब हो सकता है मेरा भारत
है अभी उम्मीद बाकी .......... !!!!!!!!!!!
* रामकिशोर उपाध्याय