=========
परिचय पवन का ....
उड़ते सूखे पत्ते और गुजरती आँधियां
खुशबू का अस्तित्व.....
उपवन के मध्य में अलौकिक अनुभूति
स्पर्श का प्रभाव .....
किसी पुष्प से हाथ मिला लेना
इतने अनभिज्ञ तो नहीं हैं आप !
फिर क्यों जानना चाहते हो मेरी पहचान
वही हाड-मांस का मिटटी का एक पुतला -इन्सान
धूप में जलता श्रमिक,
अपने लक्ष्य की यात्रा पर पथिक
समय से सीखता प्रशिक्षु
बुद्ध की तरह ज्ञान - भिक्षु
और व्यथित चितेरा.....
जीवन के रंगों का जिन्हें लेखनी से बिखेरा
क्या किसी से करते हो प्रेम ?
कभी किसी कीे मीची हैं ऑंखें ?
क्या झाँक कर देखा है किसी का मन ?
यदि हां ..............तो
वो अंतर्मन में महकती सुगंध
वो स्वेद की गंध
और स्निग्ध स्पर्श का अनुभव
वही सूक्ष्म,जितना स्थूल ..
जितना अधिक बद्ध ,,उससे अधिक मुक्त
‘मैं’ ही तो हूँ ......
हां ,मैं ही तो हूँ ........................
तुम्हारा अपना .........
*
रामकिशोर उपाध्याय
Wednesday, 10 May 2017
परिचय
आप्पो दीपो भव
----------------
आप्पो दीपो भव
------------------
मैं नहीं हूँ बुद्ध
हो भी नहीं सकता
मैंने छोड़ा कहाँ यह जग विराट
मन अभी घूम आता है कई घाट
रहता हूँ अक्सर उचाट
लेकर भरे -भरे कई माट
कुछ अहम् के
कुछ वहम के
और तलशता रहता हूँ अपना साथ
उस अंधियार में ........
जहाँ बुद्ध ने कहाँ था
आप्पो दीपो भव ......
क्या अब बढ़ने लगे ढूंढने को हाथ
मेरे ही दीपक को ........?
शायद सिद्धार्थ को हो यह पता
*
रामकिशोर उपाध्याय
Tuesday, 9 May 2017
सागर वहीँ
और वहीँ किनारा
जहाँ हमने था कश्ती को उतारा
तुम मंजिल को पा गये,
मगर
हमने तो जीवन लहरों पर गुजारा
*
Ramkishore Upadhyay
जिंदगी
कुछ उजास सी
कुछ बिंदास सी
मगर....बिन तेरे
गुजरी उदास ही
यह अनबुझी प्यास सी............जिंदगी
*
रामकिशोर उपाध्याय
Wednesday, 3 May 2017
जग भूला
कहीँ सबेरा
कहीँ अँधेरा
कहीँ पर दीपक
कहीँ पर आला
कहीँ पर सजती दीपों की माला
तब होता वहाँ उजाला
कहीँ देव खुद रचते माया
कहीँ खुद उनका मन भरमाया
बड़ा कठिन ये सब ज्ञाना
चला नित्य बस राह एक
जग भूला और खुद को जाना
*
Ramkishore Upadhyay
Saturday, 29 April 2017
निरसन
-------
आज मैं तप लिया
इस जीवन के लोहे की भट्टी में ...
मगर मेरे पिघलने से
मात्र आठ दस कीले ही बनी
यह चिंता का नहीं
चिंतन का विषय हैं ....
यह भी भ्रम नहीं है .......
कि मैं कीले बनकर किसी घर की छत में जड़ा तो गया
किसी के आशियाने की शक्ति तो बना
और यह भी कोई गर्व नहीं कि अब उन आँखों से
टप -टप पानी तो नही टपकेगा
जो हमेशा से चिंतित थी कि अचानक बरसात से
उनकी कुठार का अनाज गीला न हो जाए
वास्तव में देह की ये कीले कुछ अधिक ही चुभ रही थी
मेरी आत्मा के भीतर
यह तो मात्र निरतिः का निरसन है.....
शेष कुछ नहीं हैं........
रामकिशोर उपाध्याय
Saturday, 22 April 2017
क्या मालूम
मैं किस ओर चला
क्या मालूम ?
कॊई कहे ले गयी पवन उड़ाकर
कॊई कहता नदिया के तीर गया
ज्वाला के संग संग दिन -रात जला
या दीपशिखा संग रमण किया
जुगनू था और वही बनकर
चाँद-सितारों संग भ्रमण किया
क्या मालूम..
कभी 'मैं' ही नहीँ था पथपर
कभी 'तुम' भी नहीँ थे मील के पत्थर
तो कॊई कितनी दूर चला
क्या मालूम ??
*
Ramkishore Upadhyay