Friday, 8 July 2016

दुनियां

नई  धूप  है
नई  छाँव  है
नए पेड़  पर  नई कोंपल है
मेघ भी लेकर  आते  नया जल  है
मगर
रिश्तों की  दुनियां में फिर वही काँव -काँव है ..............
*
रामकिशोर  उपाध्याय  

Thursday, 23 June 2016

शंख हूँ मैं

रेत पर समय की
कुछ अलग सा हूँ पड़ा 
लहरों के आरोह - अवरोह से 
तट पर आ धमका 
सागर -गर्भ जनित 
मानुस के लिये
घोंघे की तरह धीरे -धीरे आता हूँ
कोई सामान्य सीप नही,शंख कहलाता हूँ
अपितु आदमी की तरह ढपोरशंख नही
करता हूँ नाद
निनाद नहीं
भोर में
साँझ में
देव के आह्वान हेतु नभ को तरंगित करता हूँ
उग्रता में
विश्व को कंपित करता हूँ
वामावर्ती
मध्यावर्ती
दक्षिणावर्ती
कुछ भी हो सकता हूँ
परंतु परहित में सदा बजता हूँ
कृष्ण के हाथ में पाञ्चजन्य
अर्जुन का प्रिय देवदत्त
युधिष्ठिर का अनंतविजय
बनकर विजय का उद्घोष करता हूँ
परन्तु काल के इतने थपेड़े खाकर भी
मैं कालकवलित नही हुआ हूँ
हूँ अभी प्रतीक्षारत
क्या तुम उठाओगे
अपने संकल्प का नाद करने हेतु बजाओगे
सोच लो
मैं शंख हूँ ,,,,,
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रामकिशोर उपाध्याय

Thursday, 16 June 2016

शांति .......



कहीं पर रोना 
कहीं पर धोना 
कहीं पर जलती कंचन काया
फिर भी लगता परचम है फहराया
लिए हुए सब बाजू में तुरुप का पत्ता
कहीं पर शान ,कहीं पर ताकत और दिखती कहीं पर सत्ता
कहीं पर उड़ता
कहीं पर गिरता
कहीं धूप तो कहीं गहरी धुँध का साया
फिर भी कहते चमन में फैली सुगंध की माया
जिधर भी देखो वन को निगल रही है अनल
घृणा और लोभ की उग रही है फसल
जन गण और मन में बढती कटुता
मिट रही है प्रेम की मृदुता
कुचल रही जनता को जनता
क्या ऐसे ही देश है बनता ?
सोचो यारों
मिलकर संग जिओ प्यारों
देखों उतर रहे नभ से यहाँ फाख्ता और कपोत
आओ मिलकर जलाये एक  प्रेम की और  एक शांति  की  ज्योत .............
.....
*
रामकिशोर उपाध्याय

Wednesday, 1 June 2016

मुसाफिर !देख समय की ओर ..........


मुसाफिर ! देख समय की ओर
मुसाफिर !देख समय की ओर ..........
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गहरी नदिया दूर है जाना
मुश्किल हैं दिल  को  समझाना
लहरें करती मिलन को शोर
मुसाफिर ! देख समय की ओर
मुसाफिर !देख समय की ओर ..........
- ..................
*
डूबें हैं सब गाँव नगरिया
देख, नांच रहे हैं सब ताल तलैया
चढ़ता पानी,चप्पू कमजोर ...................
मुसाफिर ! देख समय की ओर
मुसाफिर !देख समय की ओर ..........
-..............
*
मेघा छाये ,मन हरसाये
बालक झट से नैय्या लाये
वन में नाचा नेह का मोर ......................
मुसाफिर ! देख समय की ओर
मुसाफिर !देख समय की ओर ..........
*
मन का दादुर बोले दिन रैना
मिलन के बिना कहीं पाये न चैना
लगता खीचें कोई जैसे पतंग की ड़ोर .........
मुसाफिर ! देख समय की ओर
मुसाफिर !देख समय की ओर ..........
*
ढ़लने दे तू धार अभी
चल  जायेगी पतवार  तभी
फिर होगी मिलन की भोर ..................
मुसाफिर ! देख समय की ओर
मुसाफिर !देख समय की ओर ..........
*
रामकिशोर उपाध्याय

Friday, 20 May 2016

मैं प्रकृति हूँ !! ***********

पेड़ की तूने हर शाख काट डाली 
नदिया तूने बाँध डाली
पवन को अब तू टोकता है
धरा को गहरे तक खोदता है
और बना डाले महल दुमहले
मगर सोचा नही यह कभी पहले
ये कंक्रीट के जंगल
मेरे एक झटके में हो जायेंगे कंकड़
करके सब विनाश
करेगा तू अब विकास
अब बादलों को भी तू है बांधता
गगन को अपने निकट है मांगता
देख , यह बारिश नही जो दिख रही है
यह मेरी पीड़ा है जो अब झर रही है
जान ले जब मैं नही बचूंगी ........
तो तू कहाँ बचेंगा
अब छोड़ दे यह लम्बी ड़ोर
मत लगा अतिउत्साह में जोर
और सोच कर बता कब थमेगा यह दौर
मगर जल्दी ..
मैं प्रकृति हूँ ......युगों तक तकती नही भोर
*
रामकिशोर उपाध्याय

Monday, 2 May 2016

लिख दो बस ...........प्यार


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सोचे बिना ही उस पथ पर चली 
छाँव मिलेगी या होगी कहीं धूप मनचली 
राह में क्या मिलेगे साजना 
नीड़ के तिनके जुटेंगे या होगा तूफान से सामना
अचानक मन ने कुछ कहा
लगा कही कोई भीतर लावा बहा
थी अनमनी मगर फिर भी बूंद सा ले हौसला
बढ़ गयी बस पुष्प के आंचल से कुछ मधु चुरा
नांव ली कागज़ की और भाव की पतवार
हो रही हूँ अब लहर पर फिर सवार
यह जिंदगी हो बेशक तेज धार
मगर जाना है मुझे वहां प्रियतम रहते जहाँ नदिया के पार
लो अब हो रही हूँ खड़ी
कलम तुम्हारी उधर क्यों सुस्त पड़ी
बस लिख सको तो लिख दो बस ...........प्यार
और करते रहना इसका सदा इज़हार
*
रामकिशोर उपाध्याय

Sunday, 1 May 2016

मधुशाला


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है धरती का रंग मटमैला
और अम्बर का नीला
हो गया सपनों का रंग सुनहला
जब गोरी ने घूंघट खोला
साँसों की सरगम बजी
धड़कन ने तोडा ताला
शब्द पवन से उतर आये
बदली ने अपना मुंह नीचे कर डाला
अब देख रहे क्या धरती को
उतरों अम्बर से और नीचे धर दो पाँव पायल वाला
तुम प्रीत गीत में भर देना
जिसके गाऊं नित होकर मतवाला
आँचल में थोड़ी छांव भी रखना
और पास में रखना जिस्म सूरजवाला
बहुत पी लिया गरल जगत का
नहीं चाहिए अब द्राक्षा की हाला
जब क्षितिज पर मिलों कहीं तुम
आँखों से छलके बस मधुशाला
*
रामकिशोर उपाध्याय