Friday, 24 January 2014

यह मुक्तक जो मैं नवोदित साहित्यकार मंच पर चित्र अभिव्यक्ति में नहीं लिख सका.....
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के चल रही ठंडी पवन,,,,,,,बचने को तपन चाहिए,
पिघलने को सपने,,,बस दिल में तेरे अगन चाहिए,
तुम भी हाथ सेक लो,,और हम भी ठिठुरना छोड़ दे,
फिर आएगा बसन्त,आदमी को होना मगन चाहिये.

रामकिशोर उपाध्याय
मित्रो, आज नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जयंती हैं.मेरा शत -शत नमन उस भारत माँ के लाडले वीर को ... उन्ही को समर्पित एक मुक्तक.
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बेड़ियों में थी मातृभूमि,देख यही था उसको रोष,
मन था व्याकुल, भरा था उसकी भुजाओं में जोश , 
बना आज़ाद हिन्द सेना जिसने अंग्रेजो को ललकारा था,
वह था प्यारा,भारत माँ का दुलारा सुभाष चन्द्र बोस.

रामकिशोर उपाध्याय

ये दुनिया 
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सोचता हूँ 
अपनी रूह को 
रख आऊँ 
किसी खला में
पर
क्या
भरोसा
वहां भी हो
एक दुनिया.....

रामकिशोर उपाध्याय

इंतज़ार क्यों ?
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शाम से ही 
बैठ गए आकर 
वो सपने 
मेरी आँखों की दहलीज़ पे 
रात का भी किया 
नहीं इंतज़ार .....
मेरे महबूब के थे 
उसके हुस्न के थे 
उसकी वफ़ा के थे
मेरी जुस्तजू के थे
मेरी बेकरारी के थे
दिल की मजबूरी के थे
लम्बे हिज्र से उबरे
मेरे वस्ल के थे
वो मेरे अपने थे .....
उनके साथ देखे थे ...
वो सपने
करते फिर
इंतज़ार क्यों !!!!

रामकिशोर उपाध्याय

Saturday, 11 January 2014

दोहा ,,,प्रथम प्रयास --१


मित्रो, आ. छाया शुक्ल जी के कुशल मार्गदर्शन में मैंने आज दोहा लिखने का प्रयास किया हैं ...उन्हें मेरा नमन ..और यह दोहा उन्ही को समर्पित ...सादर 


विधा ==दोहे मात्रिक छंद
 प्रथम तृतीय चरण में १३ - १३ मात्राएँ
द्वितीय चतुर्थ चरण में ११-११ मात्राएँ

व्यवहार ही महत्वपूर्ण,मित्रता या व्यापार,
सदाचार सबसे श्रेष्ठ,**जीवन का आधार.(1)
देखते ही मुखर हुये, नयन द्व और धड़कन,
चढ़ी प्रत्यंचा सासों की,हुआ प्रेम का अंकुरण.(2) 
गीत गा लिया पत्थरों ने,लुट गया सब संगीत,
क्या करना वीणा मृदंग,**जब रूठ गया मीत.(3)
हुआ बाहर भीतर सम,द्रवित भाव भरपूर,
बैरन हुई ठंडी पवन, मिलने को मजबूर. (4)
बन शिष्य सीख किसी से, रख चरणों में ध्यान,
जान लेगा रहस्य सभी ,**क्या वेद क्या पुराण.(5) 
सखा उसे ही मानिए,सुख दुःख दोऊ निभाय,
गिन-गिन दोष दूर करे,जीवन निर्मल बनाय.(6)




कर्म से ही बनता मनुष्य,साधु और शैतान,
जाना हैं किस राह पर ,,,,विवेक से पहचान.


रामकिशोर उपाध्याय

अनंत का यात्री 
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अतीत के 
कुछ एक पन्ने मुड़े -तुड़े
कुछ एक डायरियां 
कहीं से हर्फ़ उड़े 
कही बींट से सने
मेरे संदूक से कल निकले
शायद किसी भ्रमवश सहेज लिया हो
पर उनमे कहीं भी
था नहीं मेरा नाम
हो भी कैसे सकता था
ना इतिहासकार था
ना चित्रकार था
ना गीतकार
ना संगीतविज्ञ
ना कलाकार
मैं
तो इतिहास
भी न बन सका
विदा के समय में
अकेला ही तो था मैं .....
वो मर्यादा में बंधे रहे
मैं बंधन ना छोड़ सका
बस रह गया
नदी के बीच बहते जल सा .....
समय के पत्थरों से टकराता
कभी इस किनारे
कभी उस किनारे
चलता रहा किसी
ना राग में
ना द्वेष में
अनंत को जाता
एक यात्री ....
बस एक यात्री ......
यह किसी ने कहा था

रामकिशोर उपाध्याय
मेरी यादें 
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मेरी यादें 
बरगद बन गयी थी 
कोई सौ साल पुराना
पत्ते भी नहीं आते
अब तो इस पर कोई पक्षी
घोंसला भी नहीं बनाता
कोई प्रेत भी नहीं टिकता
एक रात से ज्यादा
बहुत पहले
एक बूढा फ़कीर
दिया जलाता था
साल में एक बार
अब वो भी नहीं आता
शायद पुनर्जन्म
हो गया होगा उसका
गवाक्ष से देखा
कल ही मेरे बच्चे
एक बोंजाई खरीद के लाये
बरगद के पेड़ का
मुझे लगा मैं जिन्दा हो गया
अपनी यादों में
मेरे बच्चे मेरी यादों को
पाला पोसा करेंगे
अब
मैं
विलीन हो सकूँगा ....
वहां जहाँ तुम होंगे ...