Saturday, 11 January 2014

मेरी यादें 
---------

मेरी यादें 
बरगद बन गयी थी 
कोई सौ साल पुराना
पत्ते भी नहीं आते
अब तो इस पर कोई पक्षी
घोंसला भी नहीं बनाता
कोई प्रेत भी नहीं टिकता
एक रात से ज्यादा
बहुत पहले
एक बूढा फ़कीर
दिया जलाता था
साल में एक बार
अब वो भी नहीं आता
शायद पुनर्जन्म
हो गया होगा उसका
गवाक्ष से देखा
कल ही मेरे बच्चे
एक बोंजाई खरीद के लाये
बरगद के पेड़ का
मुझे लगा मैं जिन्दा हो गया
अपनी यादों में
मेरे बच्चे मेरी यादों को
पाला पोसा करेंगे
अब
मैं
विलीन हो सकूँगा ....
वहां जहाँ तुम होंगे ...

Tuesday, 7 January 2014

कल्पना…
-----------

ये कल्पना…
भी बड़ी अजीब होती है
बेखौफ, बेलाग और बेहया
ना समय देखती
ना जगह देखती
ना सामने कौन है
ना दाएं कौन है
बस आ जाती है
बिन पैरों के
बिन पंखों के
और चलकर
एक घरौंदा
एक नीड के लिए
एक बया की तरह
बस बुनती रहती है
समय को
झंझावातों को
निरंतर चुनौती देती हुई…
कल्पना…
कहा हो चक्रपाणी ?
-------------------

मेरे सपने 
ना हुए अभी तक अपने 
जैसे परकटे परिंदे
जैसे लटके हो गले में फंदे
ना उड़ना संभव
ना जीना संभव
कहा हो चक्रपाणी ?

रामकिशोर उपाध्याय


क्या काफी नहीं हैं ?
------------------

एक टोकरी
खुशी की
एक कटोरी 
ग़म की
क्या काफी नहीं
इस जीवन जीने को ......

एक प्याला
हाला
एक चुटकी
दोस्ती का नमक
क्या काफी नहीं
जीवन सुधा पीने को...

एक अंदाज
पलटकर देखने का
कुछ एक कदम
बलखाकर चलने का
क्या काफी नहीं
किसी पे मरने को ......

एक विश्वास
अपनेपन का
एक उच्छ्वास
आकर्षण का
क्या काफी नहीं
किसी को अपना बना लेने को .......

रामकिशोर उपाध्याय
अर्थ कुछ तो होगा ......
--------------------------


हम 
अक्सर सोचते हैं ...
सुकून हैं
तो ठंडी हवा क्यों हैं
मन भीगा हैं
तो बारिश क्यों हैं
जिस्म जल रहा हैं
तो लू क्यों नहीं चली
इन नित नयी
और कभी कभी
हमारे लिए निर्थरक बातों में
कुछ
तो अर्थ होगा ....
शायद
हमारी तार्किक बुद्धि के परे
जैसे बारिश में खड़े हो
और भीगे नहीं ........
या फिर धूप में चल रहे हो
और पांव जले नहीं ........

रामकिशोर उपाध्याय
ये डूबती मीनारें 
------------------

खड़े हैं तने कंगूरे
किसी मीनार के 
उभरे हैं अक्स 
किसी दीवार पे
पुष्प और पत्ती व वल्लरी के 
अनुपम सौन्दर्य के 
हम भी खुश हैं उन्हें देखकर 
उनके पत्थर पर
लिखे शासकों के नाम पढ़कर
ये मीनारे...
ये अक्स ....
उन लोगों की
व्यथा को भी कहते हैं
उन अनजान लोगों का
इतिहास भी कहते हैं
जिनके कभी हाथ टूटे
और कभी काट लिए गए
बिन किसी अपराध के ....
बिन किसी प्रतिरोध के .....
इन्हें तामीर करने में
शायद किसी दिन
भग्नावशेष बोल उठे
और कहने लगे
उनका श्रमिकों का इतिहास...
करते हुए आततायियों पर अट्ठाहास.....

रामकिशोर उपाध्याय
लम्बी सुरंग ------


जीवन 
में कभी कभी 
लगता हैं
कि घुप्प अँधेरा
लील जायेगा
अन्तकरण के उजास को भी
तभी एक चाहत अनमनी सी
जगती हैं
कि कोई आकर थाम ले
बस एक ऊँगली
जब हो उजाले
तो अंधेरों से शिकायत न हो
और उजाला कभी भी
दूर नहीं होता
लम्बी सुरंग के पार भी दिखता हैं
और अपने पास भी
चाहे कोई तो
अपनी उँगलियों के पोरुओं से देख ले............
शर्त एक ही हैं
आपके नाखून ना बहुत बढे हो.........

रामकिशोर उपाध्याय