Sunday, 5 January 2014

ये लकीरे .........
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धुंधली 
पड जाये वो लकीरे 
या हो जाया धुंधलका 
उस जगह पर 
जो बांटती हो
इन्सान को
मुझे वैसे रहना भी नहीं
उस जगह पर
जहाँ उगते हो
नफरत के नागफनी
जहाँ बदल जाता हैं
हो किसी का मजहब
काग़ज के टुकड़े देखकर
जिन्हें हम रद्दी की टोकरी में
फैंकते नहीं पुराना होने पर भी
क्या मजहब
क्या सियासत
सब इन कागज़ों के भरोसे चलते हैं
कुछ को ये चलाते हैं
कुछ इनको चलाते हैं
मुझे भी कुछ ही चाहिए
लुटाने के लिए
उनपर
जो मिटा दे
ये लकीरे ............

रामकिशोर उपाध्याय
Journey ,,,must enjoy..
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The chariot moves on
The charioteer keeps on
Going with destination in mind 
In the storm and unfavourable wind
Braving in sun from dawn to dusk
Full of butter and sometimes husk
In the belly under the chin
Heart with courage and desire to win
Never stops
Never broods
Over the travails of travel
Yet, no napping, no interval
Just looking with eternal joy
Legs in spikes and kicking the success ball like a toy.

Ramkishore Upadhyay
1.1.2014
WELCOME 2014 
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Hold your breath
Have faith 
Just some days are gone 
Why one should moan
Life in most beautiful forms is yet to come
Many a flowers are yet to bloom 
Then why should one gloom

Ramkishore Upadhyay


मित्रो,नव वर्ष 2014 का हम स्वागत करते हैं.....कुछ इस तरह से
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के बीती बाते बीत चुकी हैं अब इन्हें भुलाया जाये ,
बाहर खड़े जो पल सुहाने अंदर उन्हें बुलाया जाये.

कल छप्पर मेरा उड़ गया तेज पवन के झोंकों से ,
आज लपक कर तिनको से फिर नीड बनाया जाये.

कहीं बीते साल के सपने सिर्फ रह ना जाये सपने,
सच्ची मेहनत से अपनी इनको सच बनाया जाये.

किसी माँ की आंख से आंसू ना कभी गिरने पाए,
कभी बच्चा बनकर किलकारी से उसे हंसाया जाये.

गुजरा हुआ वक़्त आता नहीं दोबारा,जानते हैं सब,
फिर नए साल में यादों का जश्न खूब मनाया जाये.

Ramkishore Upadhyay
31-12-2013
तुमने क्या राग छेड़ दिया,
दग्ध ह्रदय को कुरेद दिया,
देखा प्रतिकूल समय-गति,
तो क्यों चक्र ही तोड़ दिया. 


साजन भी व्याकुल और सजनी अधीर,
दमकत हैं दामिनी,बादल उड़े बिन नीर , 
गीतों में भरी वेदना ,संगीत लगता शोर, 
अभिसार हुआ दुर्लभ,मरघट बना शरीर.



उनसे कह दो धूप में बाहर ना जाये,
रहे पोशीदा और चिलमन ना उठाये,
फलक पर छाये हैं बादल मालूम हो,
नाजुक बदन हैं कहीं फिसल ना जाये




के नाकाम तमन्नाओं से जिस्म*जलते हैं,
फिर ये पिघलकर क्यों अश्क बन बहते हैं.



ना सागर हूँ ठहरा हुआ,ना बहका किनारा,
मौज -ऐ-दरिया हूँ, खुद से इश्क का मारा.
मेरी हसरतों का कारवां 
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कोई 
दूर से ही गुजर गया 
कोई
पास आकर दूर चला गया
यूँ ही बस
मेरी हसरतों का कारवां
जंगल -जंगल
बस्ती -बस्ती
जिस -जिस रास्ते से गुजरा
हर तरफ
अजीब से सन्नाटे से एक बड़ा शोर उभरा ......

रामकिशोर उपाध्याय
चलो फिर एक बार
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चेहरे पे 
गिरा लूं केश 
या चश्मा लगाकर 
छिपा सकता हूँ स्वयं को स्वयं से क्या ?.

झूठ बोल कर
मुकर भी जाऊं किसी के सामने
सच आईने के सामने खड़ा होने का
साहस कर सकूँगा क्या ?

वोट लेकर एक बार
चुनाव जीत भी जाऊं
लोगों की भेदती नजरों से बच भी जाऊं
मन का चैन जीत पाऊंगा क्या ?

नश्वर इस देह को धरते हुए
कुछ को प्यार करूँ
या कुछ को दुत्कार दूं
अमरता पा सकूँगा क्या ?

चलो फिर एक बार
स्वयं से अजनबी बन जाता हूँ .....

रामकिशोर उपाध्याय