Monday, 5 August 2013

मेरे शहर में शब्दों की जुगाली
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शब्दों के छप्पर से 
विचारों की बूंदे 
तेज़ बारिश में ही गिरती हैं 

लिपा पुता आंगन जल्दी बह जाता हैं 
पर यथास्थिति का ढीठ मोटा बिछौना 
बडे  संघर्ष के बाद ही भीग पाता हैं

लोग अब पक्के फर्श बनाते
छप्पर के स्थान पर
लिंटल डालते
विचारों की बगिया में
घास के स्थान पर कैक्टस उगाते हैं

और

खुले घरों के स्थान पर
कबूतरखानेनुमा फ्लेटों में
खुद ही नहीं मस्तिष्क को
भी बंद करके सो जाते
सोचकर हम सुखी
तो जग सुखी
और अपने कष्ट पर
टेलीविज़न वालों को बुलाकर
सरकार और संसार की
बखिया उधेड़ते हैं
शब्दों की बरसों से रुकी जुगाली करते है
परन्तु शब्दों के छप्पर से एक बूंद भी
अपने सुख के विरोध में
अपनी खोपड़ी पर नहीं झेल पाते हैं. 

Ramkishore Upadhyay

Sunday, 4 August 2013

हर रात का सफ़र
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हर रात कोशिश करके तो  सुला देती   हैं मुझे
एक मेरी ऑंखें हैं जो ख्वाब में खोजती हैं तुझे

सूरज भी अक्सर सो जाता हैं साँझ की धूप में
एक चांदनी हैं जो चाँद से छिपके घूरती हैं मुझे

रामकिशोर उपाध्याय 
बस एक निवेदन ! 
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नहीं चाहिये !
ये व्यापक  गगन सारा
बस दे दो  टुकड़ा एक  प्यारा 
खिले हो जिसमे अनगिनत तारे
पूरे नभ के और सारे के सारे 

नहीं चाहिए 
ये  पवन भौचक्का  
बस दे दो एक हल्का सा झोंका 
बहती हो जिसमे सुगंध समीर 
स्पर्श जो कर दे मन अधीर 

नहीं चाहिए 
ये उपवन का बाज़ार  
बस दे दो एक पुष्प का  उपहार 
करता हो जो अनुपम अलभ्य श्रंगार 
दर्शन मात्र भर दे आनंद अपरम्पार    

नहीं चाहिए 
ये प्रेम का अनुचित व्यव्हार  
बस दे दो एक क्षण का अनुचार 
करता  हो जो शीतलता का प्रसार 
फिर चाहे भर दे हृद्य  में अनुकांक्षा  अपार  
 
रामकिशोर उपाध्याय 

Saturday, 3 August 2013

बस यूँ ही



!!!!!बस यूँ ही !!!!!

कल किसी मित्र ने प्रेम की अभिव्यक्ति पर अपनी टिपण्णी देते हुए लिखा कि ' बड़ा बकवास लिखा और कुछ नया लिखये ' .पढ़कर बुरा तो अवश्य लगा . फिर भी सोच कर कुछ यह नया लिखने का प्रयास किया परन्तु प्रेम की अभिव्यक्ति से मुक्त नहीं हो पाया . आप भी कुछ राह सुझाये !



हुस्न और इश्क बहुत हुआ पर तन्हाई की बस्ती में रहते हम अकेले हैं
रुखी सूखी खा पीकर टूटी खाट पे सो जाये  जो हम वो मस्त अलबेले हैं

गुलों की खुशबू , मस्त पवन ,झूमते भंवरे , रूठती रमणी से लेना क्या
दिन भर खटके, बू से भीगके,जिस्म तुडाके देता मालिक तब दो धेले हैं

क्या ज़ज्बात, क्या खयालात,क्या अरमान,क्या तिश्नगी और बेवफाई
जल्दी उठना, धूप में जलके चांदनी ओढ़ना  बस यूँ ही जीवन को ठेले हैं

Ramkishore Upadhyay








उन्वान ' तन्हाई '  --- मैं ,,,,,हूँ ,,,,ना 

तन्हाई में हम क्या कर बैठे
बेवजह उनसे दिल लगा बैठे 

बुत होते तो शायद सुन लेते  
राह के पत्थर  खुदा बन बैठे  
 
रामकिशोर उपाध्याय 
3.8.2013
छोड़ बैठे हम !
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खुदा को छोड़ बैठे हम  
जब नाखुदा ने डरना नहीं कहा

साहिल से लड़ बैठे हम
जब लहरों ने फैलना  नहीं कहा

अश्कों से रूठ  बैठे हम
जब आँखों ने बहना नहीं कहा

मंजिल से चिढ बैठे हम
जब पवन ने रुकना नहीं कहा

पाबन्दी को तोड़ बैठे हम
जब कल्पना ने सीमा नहीं कहा

Ramkishore Upadhyay

Friday, 2 August 2013

आज कल देखा

आज सूरज को लम्बे डग भरते देखा
जब शाम को चाँद ने उसे घूरके  देखा

जब सितारों  ने सुबह को उगते देखा 
तब चंद्रमा को कोटर में छिपते  देखा

सृष्टि को जंतु  जगत को रचते देखा
वन में पुष्पों को पल्लवित होते देखा

पत्तों पे ओंस  को मोती बनते देखा
संध्या काल में फूलों को गिरते देखा 

आशा को घोर निराशा  मिटाते देखा
उत्कोच को  अपेक्षा में बदलते  देखा  

जीवों को इस कालचक्र में जीते देखा
इसी क्रम में कालकलवित होते देखा 

रामकिशोर उपाध्याय